Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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महारानी लक्ष्मीबाई सी वीराँगना

महारानी लक्ष्मीबाई सी वीराँगना

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विश्व-विध्यालय में, मैं इतिहास की प्रोफेसर थी। मैं स्वयं डॉक्टरेट थी। कई छात्र छात्राओं ने, मेरे मार्गदर्शन में पीएचडी की थी/कर रहे थे। नेहा भी इस समय मेरी ऐसी विध्यार्थी थी।

उसने पीएचडी का विषय "आज चाहिए महारानी लक्ष्मीबाई सी वीराँगना" चयन किया था।

उसे गाइड करने के लिए, मुझे भी महारानी पर, गहन अध्ययन करने का सौभाग्य मिला था। इस सबमें, मैं उनकी अनन्य प्रशंसक हुई थी।

रानी झाँसी के अतिरिक्त, मैं एक और व्यक्ति से अत्यंत प्रभावित थी। ये, डॉ॰ वर्गीज़ कुरियन थे, जो हमारे देश मे सफेद क्रांति के प्रणेता थे।जिन्होंने अद्भुत प्रशासनिक कौशल और समर्पण का परिचय देकर, कोआपरेटिव के माध्यम से, दुग्ध उत्पादकों को अच्छे जीवन अवसर उपलब्ध कराये थे। डॉ॰ कुरियन ने, सहकारिता में, उपलब्धियों के माध्यम से, देश/समाज सेवा का, अभूतपूर्व कीर्तिमान भी रचा था।

इन दो आदर्शों ने प्रेरित कर मुझे यह ललक दी थी कि काश! मैं, अपने जीवन में, कुछ ऐसी उपलब्धियाँ अर्जित करूँ। 

फिर दुनिया पर, यह कोरोना संक्रमण विपदा आई थी। मेरा तभी से, इसमें अपनी कोई भूमिका लेने का मन करने लगा था। 

लॉक डाउन के कारण मुझे, छुट्टियाँ मिली हुईं थीं। अपने 8 एवं 5 वर्षीय दो बेटों, बैंक अधिकारी पति (जिनकी ड्यूटी जारी थी) एवं पापाजी (पति के पिता) के बीच, घर में सानंद रह रही थी।

साथ ही सोते जागते, हर समय, मेरे मन में वैचारिक घोड़े दौड़ते रहते थे। सरकार एवं प्रशासन के समक्ष, कोविड-19 से पेश आ रही चुनौतियों में, निपटने में, सहायक होने के लिए, मेरे अपने योगदान का प्रकार खोजती रहती थीतब एक नई समस्या उत्पन्न हो गई थी। हमारे नगर के झुग्गी-झोपड़ी में संक्रमण सामुदायिक प्रसारण चरण (Community Transmission Stage) में आ गया था। नारी ह्रदय में ममता एवं करुणा का वास, ज्यादा होता है।

मुझे हजारों के मारे जाने की आशंका दिखने लगी। लगने लगा कि अभाव में एवं कम पढ़े लिखे, वहाँ के लोगों को, उनके घर तक भोजन की व्यवस्था न की जा सकी तो, अराजकता फ़ैल सकती है। सरकार, प्रशासन और डॉक्टर्स की मुश्किलें और बढ़ सकती है। साथ ही कोरोना से मौत विकराल रूप ले सकती हचुनौतीपूर्ण इस परिस्थिति में मेरे दिमाग में एक योजना आई थी।

अपने दो आदर्शों में से एक, मुझे प्राण तक बलिदान करने को प्रेरित कर रहीं थीं। दूसरे सहकारिता आंदोलन के नेतृत्व की, मुझे, सूझ बूझ ग्रहण करने को प्रेरित कर रहे थे। दिन में मेरे मन में, इसकी विस्तृत कार्य विधि ने आकार ले लिया था।

अब मुझे प्रतीक्षा थी, शौर्य (मेरे पति) के ड्यूटी के बाद घर लौटने की।

रात्रि भोजन के पूर्व पापा जी, शौर्य और मैं पापा जी कमरे में अधलेटे से चर्चा कर थे। तब मैं, अपनी ठानी बताने के लिए, तन कर बैठ गई थी। उन्हें, अपनी योजना का ब्यौरा सुनाया था। मैंने फिर उनसे, उनके परामर्श के लिए पूछा था।

शौर्य से पहले, पापा जी ने उत्तर दिया था- बेटी, तुम्हारा कार्य दो चार दिनों का नहीं, महीनों का हो सकता है। तुम, सोच लो बनाये रख सकोगी यह हौसला? जबकि वह चुनौतियाँ भी आ सकती हैं, जिनकी तुम्हें अभी कल्पना ही नहीं।

मैंने दृढ़ता से कहा था- पापा जी, मुझे ज्ञात है कि मेरे इस कार्य में मेरी, जान तक जा सकती है।पापा जी ने कहा था - ठीक है बेटी, घर में, सबके लिए भोजन तैयार करना और बच्चों की सम्हाल मैं ले लेता हूँ। मेरी ओर से, हाँ है।

अब गेंद, शौर्य के पाले में थी।      

हमेशा की तरह अपने ओंठों पर मन मोहिनी, मृदु मुस्कान (जिस के कारण, कभी मैं उसकी प्रेम दीवानी हो, उन पर, अपना दिल हार बैठी थी) लाते हुए, शौर्य बोले थे-

मुझे, एक महान पत्नी का पति के, पहचान बनने की ख़ुशी होगी। फिर, बच्चों सहित सबने एक साथ भोजन ग्रहण किया था।

सोने जाने के पूर्व मैंने कार्य/योजना क्रियान्वयन की, रुपरेखा एक रजिस्टर में दर्ज की थी। फिर अति उत्साह में मन को संयत किया था, और सोने के लिए, शौर्य के बगल में जा लेटी थी। जानती थी कि पर्याप्त सोना, फिटनेस एवं कार्य दक्षता की दृष्टि से आवश्यक था।

अगला दिन रविवार था। पापा जी, बच्चों के साथ और रसोई में बिजी रहे थे।

सबेरे से ही शौर्य ने, मोबाइल पर पहले, उस स्लम एरिया के पार्षद के सहयोग का आश्वासन प्राप्त किया। तत्पश्चात कुछ उनकी सहायता एवं कुछ अपने कॉंटॅक्ट के जरिये, मेरी योजना में आवश्यक, दस पिक अप वाहन, दस तखत, इतने ही सिलेंडर,चूल्हे, टेंट-चेयर, पाँच क्विंटल आटा, आवश्यक नमक किराना, 100 किलो, टमाटर, प्याज मिर्ची आदि तथा पेपर लिफाफे आदि की व्यवस्था कराते रहे। जिसके होने के बाद लगभग पचास हजार का व्यय एक दिन के लिए अनुमानित था। यह मैंने अपनी बचत में निकालना तय किया था।

फिर शौर्य ही ने पचास महिलाओं एवं कुछ ड्राइवर वाहन के परमिट, पास भी अरेंज करा लिए थे।

मैंने अपनी सह-शिक्षिकाओं एवं विद्यार्थियों में से नेहा सहित, 50 को अपनी योजना विवरण सुनाते हुए, अपने सद्कार्य एवं प्रयोजन में हिस्सा लेने को राजी किया था।

मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही थी कि शौर्य के सहयोग से, एक दिन में ही इतनी व्यवस्थायें कर लीं गईं थीं।

इससे अगली सुबह से ही हमारी योजना क्रियांवित किया जाने का रास्ता प्रशस्त हो गया था।

जिस तरह चुनाव में मतदान दल, चुनाव बूथ के लिए प्रस्थान करते हैं (मुझे मतदान कराने का अनुभव था), उसी तरह, सभी साधन सामग्री के साथ, नियत समय पर हम सबने, दस टीम में विभक्त होकर, अपने अपने साधन सामग्री के साथ झुग्गी झोपड़ी इलाके के दस चिंहित स्थानों की ओर रवानगी ली थी।  


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