Gita Parihar

Abstract


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मेरी लापरवाही

मेरी लापरवाही

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पिछले  कुंभ की बात है,हर दूसरे व्यक्ति से सुन रही थी कि कुंभ मेले का आयोजन इस बार अनूठा हुआ है, जरूर देखने जाना चाहिए। मैंने बेटी से कहा,"मैं अपने माता- पिता से कुंभ मेले के बारे में सुना करती थी, कभी देखने का सौभाग्य न हुआ,इस बार तुम मुझे ले चलो। "

बेटी ने कहा, "अगर आप गुम गईं तो ? "

मैंने कहा," मैं कोई बच्ची हूं जो खो जाऊंगी ,फिर मैंने तो सुना है ,सुरक्षा व्यवस्था बहुत अच्छी है।कल ही एक जोक पढ़ा था कि, "तीन - तीन बार बीवी को मेले में छोड़ आया, मगर कमबख्त हर बार घर पंहुचा देते हैं। "

ख़ैर, तय रहा की शीत लहर खत्म हो तब विचार बनाया जाए।

वह तो अपने काम में लग गयी, मैं खो गई पुरानी यादों में।तब बड़ी बेटी लगभग 3-4 वर्ष की रही होगी पतिदेव के किसी मित्र ने हमें रात्रि भोजन पर बुलाया था ।उनके घर के पास ही एक मेला लगा हुआ था ।हम घर से थोड़ा जल्दी निकले और विचार बनाया कि मेला देख कर, कुछ उचित उपहार वहां से ले लेंगे और उनके घर जाएंगे ।वहां काफी भीड़भाड़ थी। मैंने बेटी का हाथ पकड़ रखा था, मगर वह कभी मुझसे हाथ छुड़ाकर इनका हाथ पकड़ लेती और कभी फिर मेरा हाथ पकड़ लेती ।इस बीच कब उसने दोनों का हाथ छोड़ दिया और किसी अन्य का हाथ पकड़ लिया , यह हमें पता ही नहीं चला। मै एक स्टाल पर कोई सामान देखने लगी , सामान पसंद कर के पति को दिखाने के लिए मुड़कर उनकी तरह देखा तो पाया कि वे अकेले खड़े हैं, बेटी तो कहीं है ही नहीं ! मैं सामान छोड़ कर , दौड़ी हुई इनके पास आई।तब इनका ध्यान भी इस और गया कि बेटी कहां है।हम बदहवास हो गए ।

दिमाग ने काम करना बंद कर दिया, उसे इधर उधर खोजने लगे। इन्होंने कहा," मैं गेट की तरफ जाता हूं ,निकलने वाले गेट से निकलेंगे ,तुम इधर देखो "।मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे और मैं ईश्वर का नाम ले रही थी कि मेरी बेटी कहां है, ईश्वर उसे मुझसे मिला दे ।"

जैसे ईश्वर ने सुन लिया , सामने से देख रही हूं ,दो तीन महिलाएं उसका हाथ पकड़े चली आ रही हैं ।मैंने दौड़कर उसे गोद में ले लिया। वे कहने लगी," हम आपके ही पास ला रहे थे" अब हकीकत क्या थी ,मुझे नहीं पता मगर मैंने उनका दिल से धन्यवाद दिया, अब मैं गेट की तरफ लपकी। पतिदेव के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं , बेटी को सकुशल देख उनकी आंखें भीग गईं थीं,उसे कस के गले से लगा लिया।

अब हमें रात्रि भोजन के लिए गुप्ता जी के यहां जाना था ।जब पहुंचे तो उनकी अनुभवी पत्नी ने हम दोनों के चेहरे के रंग को देखकर पूछा," क्या हुआ,क्या दोनों लड़ कर आए हो ? " हमने सारा वाकया उन्हें बताया कि क्या हुआ था और हम कहां से आ रहे हैं ।गुप्ता जी की पत्नी, जो आयु में मुझसे काफ़ी बड़ी थीं, मुझे आड़े हाथों लिया और डांटना शुरू किया," कैसी मां हो जो बच्ची का ख्याल नहीं रख सकती हो, बच्चा मां के हाथों से छूट भी कैसे जाए ?"मेरी आंखों से आंसू बह निकले।बात को संभालते हुए गुप्ताजी ने कहा,"श्रीमतीजी,आज क्या डांट से ही पेट भरा जाएगा या भोजन भी मिलेगा?"

मैंने ईश्वर का धन्यवाद किया और प्रार्थना की कि भविष्य में ऐसा क्षण ना आए कि मेरी बच्ची ,मेरी लापरवाही से ,मुझसे छूट जाए।

 


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