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Vijaykant Verma

Abstract


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Vijaykant Verma

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क्या वो पापी थे

क्या वो पापी थे

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मोनू मां के दर्शन को जाने वाली थी। पूरी तैयारी हो चुकी थी। तभी टीवी में एक समाचार को सुन कर दहल गई वो..! समाचार था, की वैष्णो देवी को जाने वाली मां के भक्तों से लदी एक बस गहरी खाई में गिर गई और बस के ड्राइवर कंडक्टर सहित चालीस लोगों की जान चली गई..!

इस समाचार को सुनते ही उसके होश उड़ गए..! उसके मन में बहुत सारे सवाल अचानक दस्तक देने लगे..!

मां, दया की मूर्ति, उसके दर्शन को जाने वाले भक्तों के साथ ये हादसा क्यों हुआ..? कहते हैं, मां खुद ही अपने भक्तों को अपने पास बुला लेती है। कुछ ऐसा संयोग बन जाता है, कि आपका प्रोग्राम अचानक ही मां के दरबार में जाने का बन जाता है, और सारी व्यवस्था जैसे अपने आप ही हो जाती है।

पर इस बस दुर्घटना में जितने लोग भी मरे हैं, वो भी यकीनन मां के भक्त ही होंगे, फिर उनके साथ ये हादसा क्यों हुआ..? और वो बस का ड्राइवर, कंडक्टर तो वर्षों से उसके भक्तों को उसके दरबार में लाने के नेक काम को अंजाम दे रहे थे..! वो बेचारे भी तड़प तड़प कर मर गए..?

उफ..! कितना दर्द हुआ होगा उन्हें..! एक इंजेक्शन के लगने से भी अक्सर हम कितने घबरा जाते हैं, तो घंटो तक मां के वो भक्त, ड्राइवर, कंडक्टर एक्सीडेंट के बाद बस में बिना किसी दवा इलाज के खून से लतफत जब तड़पे होंगे, तो कितना दर्द हुआ होगा उन्हें..!

दुर्घटना के कारणों की अभी समीक्षा चल रही है। कोई ड्राइवर की लापरवाही को कारण बता रहा है, कोई उसके कानों में लगे हेडफोन को दोष दे रहा है, तो कोई बस के सामने अचानक किसी बाइक के आ जाने को कारण बता रहा है, पर सवाल तो इस बात का है, कि मां के दरबार में जाते समय ऐसा क्यों हुआ..?

कहते हैं, कि मां के दरबार में जाने वालोँ की रक्षा तो खुद मां करती हैं..! तो क्या मां ही उनसे रूठ गईं थी..? और इसीलिए बस खाई में गिरी..? या वो इतने बड़े पापी थे, कि उनके पाप ने ही उन्हें मां के दरबार तक पहुंचने न दिया..! या ये भी कह सकते हैं, कि मां ने ही उन पापियों को उनके किये की सज़ा दी, और उनका अंत कर दिया।

पर प्रश्न फिर उभरा, कि ग्रंथों में तो यही लिखा है, कि कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, अगर वो मां की शरण में आ जाये, तो मां उन्हें अपने शरण में ले लेती है, और उनके अपराधों को क्षमा कर देती है..! और इसी उम्मीद से तो भक्तगण जाते हैं मां के दरबार में, कि मां उनके पापों को बख्श दें, और उन्हें अपना आशीष दे, जिससे उनका जीवन सुखमय और पाप रहित हो..!

पर इस बस के मुसाफिरों, भक्तगणों पर मां की कृपा क्यों नहीं हुई..? अगर कल मैं भी उसी बस में होती, तो क्या मैं बच जाती..? और अगर न बच पाती, तो क्या मेरा नाम भी ऐसे पापियों की लिस्ट में होता, जिन्हें मां ने खुद मौत की सज़ा दी है..? उनका संहार कर के, उनकी बस को खाई में गिरा के..?

मां का तो काम ही है भक्तों की रक्षा करना और दुष्टों का संहार करना..! तो शायद निश्चय ही उस बस में सवार सभी पुरुष, स्त्री, बच्चे दुष्ट रहे होंगे, और इसीलिये उन्हें तड़प तड़प कर मरना पड़ा..?

अचानक मोनू ने सोचा, उफ्फ..! उसने भी तो बहुत सारे पाप किये हैं..! मम्मी, पापा, दादी, दोस्त सब तो उससे खफ़ा ही रहते हैं..! मां के मंदिर भी जब कभी वो गई, मानो एक र ही उसने निभाया..! अगर मां की आरती भजन भी कभी किया, तो बस जैसे तैसे..! तो दुष्ट तो वो खुद भी है..! कहीं मां ने उसे भी अपने दरबार में पहुंचने से पहले ही सज़ा दे दी, तब क्या होगा..? कितनी ही देर तक वो इसी उधेड़बुन में लगी रही, और टाइम का उसे अंदाज़ ही नहीं रहा। पता तो उसे तब चला, जब उसने अचानक उसकी निगाह घड़ी पर गई..! उसने घड़ी देखा, तो मालुम हुआ कि उसकी ट्रेन के छूटने में सिर्फ एक घंटा ही बचा था। उसने जैसे तैसे अपना सामान बाहर निकाला और टैक्सी से स्टेशन पहुंची और भागते भागते अपनी पूरी कोशिश करने के बावजूद वो ट्रेन न पकड़ सकी और उसके सामने ही जम्मू को जाने वाली उसकी ट्रेन छूट गई..!

चूंकि उसकी बर्थ रिज़र्व थी, इसलिए किसी और ट्रेन से जाना भी अब नामुमकिन था, क्योकि आगामी एक माह तक जम्मू जाने वाली किसी भी ट्रेन में कोई बर्थ खाली नहीं थी..!

वो बुझे मन से वापस घर आई और धम्म से अपने बिस्तर पर गिर गई..! बहुत देर तक वो यूँ ही पड़ी रही, जैसे उसके जिस्म में जान ही न हो..! तभी अचानक उसकी आँखों में खुशी के आंसू आ गए और वो मां से बोली-"धन्य मां..! तुम्हारी जय हो। तुमने मुझे अपने दरबार में नहीं बुलाया, और किसी बहाने से मेरी ट्रेन छुटवा दी, पर मैं ज़िंदा हूं, ये क्या कम है..! और शायद ज़िन्दगी में पहली बार उसने दिल से मां की आरती की और भजन गाया~

जय जय मां !

जय जय मां !

तेरी कृपा हो तो मौत भी टल जावै

जीवन में सुख शांति आ जावै

अंधकार की सुनी डगर में

खुशियां और रौनक आ जावै

भक्तों पर बलिहारी मां

जय जय मां !

जय जय मां !


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