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शशांक मिश्र भारती

Abstract

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शशांक मिश्र भारती

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खेत वहीं का वहीं

खेत वहीं का वहीं

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                    कभी जाड़े की ठिठुरन के बावजूद अल्कू का झबरू कुत्ता खेत की निगरानी से पीछे न हटता था ।नींद आने पर दोनों आपस में लिपट कर सो जाते थे ।

        फसल भी पककर उसका एक एक दाना सुरक्षित घर पहुंच जाता था ।

          आज जब हम अपने आस पास नजर डालते हैं तो सायौ होते ही खेतों की ओर कजम बढाते नजर आते हैं ।जिनको झबरू कुत्ता के साथ उसका मालिक भी खेत से भगाने में असफल हो जा रहा है ।

      यह अन्तर केवल इन जानवरों के पालतू जंगली हो जाने से ही नहीं अपितु मशीनीकरण व सरकारी मशीनरी के द्वारा इनका कागजों और गौशालाओं में  चारा खा जाने से भी आया है ।

     परिणाम शत प्रतिशत दाने के स्थान पर साठ-सत्तर प्रतिशत ही घर पहुंच पा रहा ।खेत वही का वहीं ।


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