होली क्यों व कैसे ?
होली क्यों व कैसे ?
भारत त्यौहारों का देश हैं यहां पर जितने त्यौहार सालों भर मनाये जाते हैं। विश्व में शायद ही कोई देश होगा।उसमें भी हिन्दुओं का तो हर दिन ही कोई न कोई त्यौहार रहता है।हिन्दुओं के चार प्रमुख त्यौहारों रक्षाबन्धन दशहरा दीपावली और होली में से होली साल का अन्तिम और महत्वपूर्ण त्यौहार है।यह फाल्गुन महीने की पूर्णिमा और चैत्र माह की प्रतिपदा को दो दिन तक मनाया जाता है।पहला दिन होली होला या होलिका के नाम से प्रसिद्ध है तो दूसरा दिन धुलेड़ी धुरड़ी धुरखेल या धूलिवंदन के नामों से अलग अलग क्षेत्रों में जाना जाता है।पहले दिन जहां होलिका दहन होता है तो दूसरे दिन होलिका पर नये अनाज से पूजन के बाद रंग गुलाल का उत्सव होता है।दोपहर बाद स्नान कर मन्दिरों में जाते हैं।उसके बाद घर घर जाकर एक दूसरे के गले मिलते हैं।बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
होली के दिन से ही जगह जगह ढोलक की थाप पर फाग का गाना आरम्भ हो जाता है। जगह जगह पर धमार का गायन होता है।जिसमें समूह के समूह गाते बजाते हुए घरों में जाते हैं।धमार का गायन और वादन पुरुषों तथा महिलाओं की अलग अलग टोलियां करती हैं।होली का मौसम बसन्त का होता है।अतः चारों ओर सरसों खिल उठती है।बाग बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा चारों ओर बिखरी होती है।खेतों में गेहूं जौ चना मसूर मटर और अलसी दानों से भरी किसानों के घरों को जाने के लिए उतावलापन दिखलाती है।
वैसे तो होली का प्रमुख पकवान गुझिया है जोकि लगभग हर घर में बनता है और होली मिलने आने वालों को बड़े उत्साह से खिलाया जाता है।इसके अलावा कचरी पापड़ मेवे और मिठाईयां भी घरों की शोभा बढ़ाते हैं।होलियारों को अपनी ओर खींचते हैं।
होली मनाने के सम्बन्ध में अनके कहानियां प्रचलित हैं जिनमें महत्वपूर्ण है होलिका की कहानी।जोकि दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन थी जिसको आग से न जलने का वरदान था प्रहृलाद जोकि भगवान विष्णु का परम भक्त था और जिसको मारने के लिए उसके नास्तिक पिता हिरण्यकश्यप द्वारा बार बार प्रयत्न किये जा रहे थे।ऐसे प्रयासों के क्रम में होलिका प्रहृलाद को लेकर आग में बैठी पर प्रहृलाद बच गया और होलिका जल गयी।इस घटना के बाद बुराई पर अच्छाई के जीतने के उपलक्ष्य में होली मनायी जाने लगी।दूसरी कथा राक्षसी पूतना की है।कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने शिशु अवस्था में पूतना का इसी दिन वध किया था।इसके अलावा कुछ लोग होली के बसन्तोत्सव को कामदेव के उत्सव से भी जोड़ते हैं।नयी फसल के स्वागत का उत्सव तो है ही।
यह पर्व भारत और नेपाल में एक जैसे दिनों में हिन्दू पंचांग के अनुसार मनाया जाता है।ब्रज की लट्ठमार होली बड़ी प्रसिद्ध है।कुमाऊं में बैठकी और खड़ी होली दो सप्ताह पहले आरम्भ हो जाती है।तो कुल्लू हिमाचल की होली का विश्व में अपनाही रंग है।हिमाचल में तो अब बर्फ की होली भी खेली जाने लगी हैं। जिसका बाहर से आने वाले पर्यटकों द्वारा भी आनद लिया है।
अन्त में कहा जा सकता है कि भारत में होली के अनेक रूप और रंग जिनके आधार पर इसको हर्षोल्लास से मनाया जाता है।इसी तरह होली को लेकर जनमानस में अनेक कथायें भी प्रचलित हैं।यह सब हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावित करती ही हैं।हमको जोड़ने का काम भी करती है।
