Dipesh Kumar

Abstract


4.5  

Dipesh Kumar

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जब सब थम सा गया (ग्यारहवाँ दिन)

जब सब थम सा गया (ग्यारहवाँ दिन)

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आज लॉक डाउन के 11 दिन पूरे हो गये थे। लेकिन मायूसियात बढ़ती जा रही थी। कोई सकारात्मक उम्मीद नहीं दिख रही थी। सुबह उठ कर मैं बिस्तर मैं यही सब सोच कर महसूस कर रहा था। आज मालूम नहीं क्यों उठने का मन नहीं कर रहा था। लेकिन मैंने सोचा दिन भर घर पर ही तो रहना हैं। प्रतिदिन की नित्य क्रिया करके मैं नीचे पूजा पाठ करके,नाश्ते के लिए बैठ गया। चाचीमाँ ने आज छोले और पुड़िया बनाई थी। गर्म पुड़िया और छोले खा कर मजा आ गया।

नाश्ते के बाद मैं बहार निकल कर सड़क को देख रहा था।

हालांकि सुबह का समय था तो कुछ लोग जो खेत में जा रहे थे,दिख रहे थे। इस समय गेहूं की फसल की कटाई चल रही हैं और मजदूर खेतो को फसल काट रहे हैं। कुछ ही देर मैं पुलिस की गाड़ी साईरन बजाते हुए मेरे घर के सामने वाले खेत पर आ कर गाडी रोकी,सारे मजदूर भागने लगे उनमे से एक औरत जो बच्चा ली थी नहीं भागी साथ में उसका पति भी था। मैं घर के मुख्य द्वार से सब देख रहा था। गाडी से पुलिस अधिकारी उतरे और पूछे,"तुम सब भाग क्यों रहे हो?"इतने में औरत बोली,"साहब फसल काटने के लिए बात हुई हैं खेत के मालिक से उन्होंने कहा जैसे आप लोग को सुविधा हो काट लेना शाम को पैसे दे दिया करूँगा। "तो पुलिस अधिकारी ने पूछा,"सब भाग क्यों गए? तो मजदूर बोला ,"साहब सब सोचे की आप पकड़कर ले जाओगे। "इतने में अधिकारी बोले,"अरे फसल नहीं काटोगे तो काम कैसे चलेगा ,बस मास्क या गमछा बाँध कर और दूरी बनाकर काटो,और कोई परेशान करे तो बता देना। ये मेरा नंबर हैं।

इतने में गाडी चली गयी। मैं भी इसके बाद घर के अंदर आ गया। अंदर आते देख मेरा पालतू कुत्ता रेम्बो मुझे देखकर उछलने लगा। तो मैंने उससे नहलाने का सोचा। रेम्बो को नहलाकर में फिर से नहाया,फिर मैं अपने कमरे में चला गया। वैसे सही बताऊ तो अब मैं बोर हो चूका था । टीवी,मोबाइल,खाना और सोना इन सब से मन ऊब सा गया था। मन को बहलाने के लिए मैं कुछ देर के लिए संगीत सुनने लगा। दिल खुश हो गया। इतने में मेरी बहन प्रियांशी अपने गणित के कुछ सवाल लेकर मेरे पास आ गयी,और मैं उससे समझाने लगा।

दोपहर हो गया था। रूपेश ने मुझे आवाज़ लगायी और कहा,"खाना खाने की लिए नीचे आ जाईये",मैं और मेरी बहन प्रियांशी खाना खाने के लिए नीचे चले गए। दोपहर का खाना खाकर मैं कुछ देर के लिए समाचार देखने लगा। इस दौरान समाचार देखना मतलब सर दर्द। फिर भी समाचार देखना जरूरी था। कोरोना के संक्रमितों की संख्या भारत में भी तेजी से बढ़ रही थी। ये चिंता का विषय सबके लिए था। मैं और शायद सभी इस उम्मीद मैं बैठे हैं कि जल्द ही इस बीमारी का इलाज हमारे पास आ जाये।

वैसे उम्मीद पर तो दुनिया कायम हैं।

समाचार देखकर मैं ऊपर अपने कमरे में गया। इतने में मेरे फ़ोन की घंटी बजी। फ़ोन मेरे एक मित्र का था जिनका विवाह 27 अप्रैल को होना था। मैंने सबसे पहले उनका हाल चाल लिया और उन्होंने मेरा,फिर मित्र ने क्षमा मांगते हुए कहा कि भाई मैं आज आपको विवाह के निमंत्रण के लिए फ़ोन किया हूँ। उसने कहाँ,"जैसा आपको ज्ञात हो मैंने आपको व्हाट्सएप्प के जरिए सूचित किया था कि मेरा विवाह 27 अप्रैल को होने वाला हैं,लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते अब नवम्बर में होना निश्चित हुआ हैं। इसलिए मैं आपसे विनती करता हूँ की आप नवम्बर में समीलित हो। "मैंने कहा,ये बिलकुल सही निर्णय हैं और तुमको इस चीज़ के लिए क्षमा मांगने की कोई जरुरत नहीं हैं। मैं नवम्बर मैं अवश्य तुम्हारे विवाह में सम्मिलित होऊंगा।"

बात समाप्त करके मैं कुर्सी पर बैठ कर सोचने लगा की इस महामारी के चलते सबका बहुत नुक्सान हो रहा हैं। बस जल्दी से हमे इस मुसीबत से छुटकारा मिले। मेरा मन वैसे पढ़ने का तो बिलकुल नहीं था ,लेकिन और कोई काम भी तो नहीं था। तो मैं अपनी पाठ्यक्रम की पुस्तक उठा कर पढ़ने लगा।

पढ़ते पढ़ते कब शाम हो गयी पता ही नहीं चला। मैं भी अपना हाथ मुँह धोकर नीचे पहुँच गया। सभी लोग बच्चो के साथ खेल रहे थे और पिताजी चाचाजी बैठ कर बात कर रहे थे। मैंने खुरपी (बागबानी का एक औजार)उठाई और गमलो और पौधों को सही करने लगा।

पौधों में पानी डालकर मैं रेम्बो को टहलाने के लिए बाहर निकल गया 15 मिनट बाद मैं वापिस घर में आकर बच्चो के साथ खेलने लगा। शाम की आरती का समय हो गया था। आरती समाप्त होने के बाद। हम सब दादीजी के कमरे में एकत्रित हुए और चने और परमल खाने लगे। वैसे ये सब हम लोग तब करते थे जब दादाजी जीवित थे। लेकिन अब सब अपने कार्य मैं बिजी हो गया हैं,इसलिए कभी समय नहीं मिलता था। इस कोरोना ने एक चीज़ तो हैं,सबको भाग दौड़ वाले जीवन से कुछ दिन के लिए छुट्टी जरूर दे दी। लेकिन अब ये बहुत ज्यादा परेशानी दे रहा है। सब यही प्रार्थना कर रहा हैं जल्दी सब सही हो जाये।

बात करते करते खाने का समय हो गया और हम सब खाना खाकर अपने कमरो में चले गए। लेकिन मेरा मन तो आज सुबह से ही उलझन में लग रहा था। मैं कमरे में आकर एक पुरानी मैगज़ीन उठा कर पढ़ने लगा। मैगज़ीन मैं एक लेख लिखा था जो नारी शक्ति के ऊपर थी। सच में लेखक ने जो भी बात लिखी थी वो बिलकुल सत्य हैं। वास्तव में नारी नहीं तो कुछ नहीं। मैगज़ीन का लेख पढ़कर मैं अपनी आगे की कहानी लिखने लगा। अब मैं धीरे धीरे इसका आदि होते जा रहा हूँ। लेकिन यही तो मैं सोचता था कि काश मुझे कुछ लिखने का मौका मिले। जो मेरा सपना था और अब ये पूरा हो रहा हैं। कहानी लिखने के बाद मैं बिस्तर पर आकर लेट गया।

इस तरह लॉक डाउन का ग्यारहवाँ दिन भी समाप्त हो गया। उम्मीद हैं कहानी आप सभी को अच्छी लग रही होगी। लेकिन ये कहानी नहीं हैं। ये सब मेरे लॉक डाउन के दौरान अनुभव हैं। लेकिन कहानी अभी अगले भाग मैं जारी हैं...............


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