Moumita Bagchi

Abstract Drama


4.3  

Moumita Bagchi

Abstract Drama


घर- वापसी

घर- वापसी

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नेताजी सुभाष अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन, बीस साल बाद एक बार फिर।।अपनी जन्मभूमि के फिर से दर्शन हो गए।

श्री दिलीप सेन आँखों में उत्सुकता और आश्चर्य दोनों ही भावों को संजोए अपनी लाॅगेज ट्राॅली को धकेलते हुए हवाई अड्डे के प्रस्थान गेट की ओर बढ़ते हैं। 

बीस वर्षों में यह शहर इतना बदल गया है कि मानो पुराने जैसा कुछ भी नहीं बचा है अब। इस हवाई अड्डे की पहले एक छोटी सी बिल्डिंग हुआ करती थी। परंतु जैसे अलादीन के चिराग के प्रभाव से सब कुछ बदला जा चुका है। 

कितनी व्यस्तता है आज इस जगह पर। उनके विमान के साथ ही कोई और छः अंतर्राष्ट्रीय विमानों ने यहाँ लैंडिंग की है। पहले इतने सारे विमान तो नहीं आते थे।

गेट से बाहर आकर वे कुछ परिचित चेहरों की तलाश करने लगते हैं। आज पहुँचने की इत्तला तो पहले ही दे दी गई थी उन लोगों को। जरूर किसी न किसी को भेजा ही होगा उन्हें घर लिवा ले जाने के लिए। उन्होंने एक सिरे से दूसरे सिरे तक आगंतुको के स्वागत के लिए खड़े शहरवासियों के चेहरे और हाथ में पकड़े हुए नामपट्टों को ध्यानपूर्वक पढ़ लिया था अबतक-- एक नहीं दो- दो बार।

फिर निराश होकर ट्राॅली को किनारे रखकर वहाँ पर लगी बेंच पर बैठ गए। अचानक उन्हें यह अहसास होने लगा कि अब इस शहर में उनका कोई सगा न बचा था। पर यही वह जगह है जहाँ वे पैदा हुए थे। दोस्तो के संग खेले थे, सारी पढ़ाई लिखाई, डिग्रियाँ यहीं से तो हासिल की थी, उन्होंने। परंतु माँ- बाबूजी के गुज़र जाने के बाद उनके चचेरे भाइयों ने उनकी अनुपस्थिति में मकान के उनके हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था।

फिर भी उन्हें दृढ़ विश्वास था कि अपने पुश्तैनी मकान में पहले की ही तरह कुछ रातें वे इस बार भी बीता पाएँगे। 

इसलिए अपने रुकने का कोई और इंतज़ाम न किया था। सोचा था कि चचेरे भाइयों में से कोई न कोई उनको जरूर घर के अपने हिस्से पर ठहरा लेंगे। आखिर उन्हीं को फायदा पहुँचाने के खातिर तो वे इतनी दूर मैनचेस्टर, इंग्लैण्ड, से चले आ रहे हैं। वह भी संपूर्णतया अपने ही खर्चे पर। इतनी सी इंसानीयत की उम्मीद तो वे उनसे रख ही सकते थे। 

एक सर्द आह छोड़कर वे अपना आईपैड निकालकर किसी होटल में बुकिंग करने की कोशिश करने लगते हैं।

तभी कोई महिला आकर उनके पास बैठ जाती है। वे अपनी जगह से जरा खिसक कर उनके बैठने के लिए स्थान बना देते हैं और दुबारा होटलों में रूम की तलाश करने लगते हैं। पता नहीं कितना समय रुकना पड़े, उन्हें यहाँ ? कोर्ट-कचहरी के मामलों में समय का कोई हिसाब थोड़े ही रहता है। वैसे, एक तरह से वह ठीक ही है। उन्हें भी अपने प्रिय शहर में कुछ और समय बिताने का मौका मिल जाएगा।

" तुमि दिलीप ना ?" ( तुम दिलीप हो न ?")

कोई हौले से पूछता है। परंतु इसे अपने मन का भ्रम समझकर वे ज्यादा ध्यान नहीं देते है। माथे पर सरक आई अपने कच्चे-पक्के बालों की लटों को बाये हाथ से पीछे की ओर धकेलकर वे "सोनार बांग्ला" होटल की टैरिफ चैक करने के लिए आई पैड पर झुक जाते हैं।

तभी उनके पास बैठी महिला ज़रा नाराज़गी भरे स्वर में पूछती है,

" सोत्ती कि चिंते पारछो ना ? नाकि चिंते चाओ ना ? "   ( क्या सच में पहचान नही पा रहे हो या पहचानना नहीं चाहते ?")

नाराजगी की यह अदा उन्हें परिचित सी लगी। 

अतः झट मुड़कर देखा तो पास बैठी अपर्णा को पहचानने में देर न लगी।

" अरे, अपर्णा।। तुमि ?" ( अरे, अपर्णा, तुम ?")

" जाक। चिनते पेरेछो तबे।" ( चलो, आखिर तुमने पहचान लिया।) कहकर वह ज़रा सी मुस्कराई।

अपर्णा की उम्र अभी हालांकि पचास से कुछ ऊपर हो गई थी। उनसे एक ही साल छोटी थी वह। शायद कुछ महीना होगा, अभी ठीक- ठीक याद नहीं है। परंतु उसके बालों में सफेदी अभी तक न आ पाई थी। या हो सकता है कि कॅलर लगाती हो।

 क्रीम काॅलर की घीचा सिल्क की साड़ी पहने एक छोटी सी ट्राॅली और हैण्ड बैग के साथ वह किसी के आने की प्रतिक्षा कर रही थी। बोली,

" होटल बुकिंग करने से पहले एकबार मेरे घर चलकर तुम्हारी पसंद की अदरक वाली चाय पी लेते ? फिर वहीं बैठकर आराम से बुकिंग करना। ड्राइवर गाड़ी लेकर आता ही होगा।"

फिर उसने पूछा,

" आजकल कहाँ पर हो ? विलायत में ही ?"

" हाँ, मैनचेस्टर में रहता हूँ। अच्छा, तुम कह रही हो तो, चलूँगा। क्या वहीं, रासविहारी एवेन्यू में हो, अभी तक ?"

" हाँ, हाँ, उसी घर पर रहती हूँ।"

" कहाँ से आ रही हो ?"

" एक काॅनफेरेन्स के सिलसिले में सिंगापुर गई थी, वहीं से--"।

दिलीप ने अपर्णा की लगेज की ओर देखा। शुरु से ही उसे लाइट लॅगेज के साथ ट्रेवेल करना पसंद था।

इस समय ड्राइवर गाड़ी लेकर आ जाता है और दरवाज़ा खोलकर खड़ा हो जाता है। दोनों के सामान गाड़ी की बूट में रखवाकर अपर्णा और दिलिप पिछले सीटों में आराम से बैठ जाते हैं। ड्राइवर एसी ऑन कर देता और इंजन स्टार्ट कर अपने गंतव्य को रवाना होता है।

अपर्णा पहले उसकी सहपाठी थी, फिर प्रेयसी बनी और आगे चलकर उसकी पत्नी भी बन गई थी। लेकिन लीड्स यूनिवर्सीटी का ऑफर लेने से पहले दोनों का तलाक हो चुका था। आजकल दोनों सिर्फ अजनबी थे। या सिर्फ "पूर्व- परिचित" कह लीजिए बस।। अचानक इसी शहर में कदम रखते ही नाटकीय ढंग से उससे दुबारा भेंट हो गई।

याद है जिसदिन वह विलायत जा रहा था। सगे संबंधियों के बाद अपर्णा भी आई थी उस दिन। कैसा संयोग है।।

अपर्णा उन दिनों पीएचडी कर रही थी जादवपुर से। उसकी माँ भी बीमार रहा करती थी। अतः वह देश छोड़कर जाना नहीं चाहती थी।

गाड़ी अब बागुईहाटी, केष्टोपुर के भीड़- भाड़ वाले इलाके को पार करके वी आई पी रोड पर आ चुकी थी। और थोड़ा सा आगे चलकर बंगाल केमिकल्स को पार करके अब इ एम बाईपास पर सरपट भाग रही थी।

" एक नया राजारहाट वाला रोड भी निकलता है एयरपोर्ट के पास से, वह वाला रास्ता जरा शार्ट भी है, परंतु मैंने सोचा कि शायद तुम अपनी वाली कोलकाता से मिलना चाहो-- इसलिए ड्राइवर को इधर से लाने को बोला था।"

गाड़ी इस समय हायत रिजेन्सी होटल के पासवाली लालबत्ती पर खड़ी थी।

" अच्छा-- अच्छा किया।" कहकर दिलीप अपर्णा को देखकर ज़रा मुस्करा दिया। फिर जरा अपनी पीठ सीधी कर पूछा,

" तुम्हारी माँ अभी कैसी है ?"

" माँ को गुज़रे हुए पंद्रह साल हो गये। "

" oh, I am sorry।" 

"मुझे नहीं मालूम था, यह।"

" हाँ, ठीक कहते हो, तुम्हें कैसे पता होगा यह सब ?" 

कहकर उसने एक फीकी सी मुस्कान दी। इसी मुस्कान के साथ उसका हल्का-सा दर्द जैसे बाहर आ गया था।

अपर्णा स्वभाव से बहुत अंतर्मुखी थी। आसानी से सबके सामने अपना दिल नहीं खोलती थी। और इस कारण उसके दुःख दर्द तक कोई पहुँच न पाता था। दारुण दुःख में भी वह इतनी शांत रह सकती थी कि कभी- कभी दिलीप को लगता था कि उसकी धमनियों में लहू के स्थान पर कहीं बर्फ न बहता हो।

चार नंबर ब्रीज के ऊपर से उनका सफेद हन्डा सीटी तेजी से जा भागे जा रही थी। शाम के समय की बाहर की ताज़ी ठंडी हवा में दिलीप के बाल उड़ने लगे थे। उसे बड़ा अच्छा लगा।

कुछ समय बाद वे रासविहारी पहुँच गए थे। कमरे का दरवाज़ा खोलने के बाद, दिलीप ने उससे पूछा, 

"अकेली रहती हो यहाँ ?"

" और दूसरा कौन होगा ?" कहकर वह फिर हँस दी। पूछी,

" तुम्हारी यूरोपियन वाइफ, कैसी है ?" 

" कौन एमेली ? चार साल पहले डाइवोर्स हो गया है हमारा। सुना है कि उसने दुबारा शादी कर ली है। ठीक ही होगी।"

" ओह, साॅरी मुझे नहीं मालूम था यह।"

" हाँ, तुम्हें कैसे मालूम होगा, अपर्णा।" उसने उसी तरह से कहा जैसे कि थोड़ी देर पहले अपर्णा ने उससे कहा था। इस पर दोनों खिल- खिलाकर हँस पड़ते हैं।

मनुष्य स्वभाव सदैव परिवर्तन शील है। लोग कभी एक जैसे नहीं रहते हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार वे अपने आपको ढाल लेते हैं। 

अपर्णा को ही देख लो। वह चुपचाप सी रहने वाली लड़की न जाने कहाँ अपने अंदर इतनी ज़िन्दादीली छिपा रखी थी।

उस रात को अपर्णा दिलीप को होटल जाने नहीं देती है। वहीं अपने घर में उसका ठहरने का इंतज़ाम करा देती है।

 बहुत बड़ा घर था। नीचे की दोनों मंजिलों पर किरायेदार थे। और तीसरी मंज़िल पर सात- आठ कमरों को लेकर अपर्णा का अकेले का सारा संसार फैला हुआ था। वह वासंती देवी काॅलेज में पढ़ाती थी।

दिलीप को यहाँ आकर लगा कि जैसे उसे उसका बचपन और जवानी के सुनहरे दिन वापस मिल गए है। अपर्णा को देखकर वह आश्चर्य चकित था। उसका व्यवहार ऐसा था कि मानों कुछ भी न बदला हो इतने सालों में उनके बीच। 

सारे गिले- शिकवे मानो मिट से गए थे। गाड़ी का गंभीर वातावरण घर आते ही पल भर में छूमंतर हो गया था।और वे दोनों ही काॅलेज के दिनों की ही तरह हँसी- मज़ाक में खो गए थे।

अगले दिन अपर्णा ने काॅलेज के सभी दोस्तों को अपने घर पर बुला लिया और सभी ने मिलकर दिलीप के आने की खुशी में एक जश्न-सा माहौल बना डाला। पचास के अधिक उम्र वाले लोगों के चेहरे पर इतना जोश, इतना चमक शायद पहले कभी न देखा गया था। 

अगले दिन सुबह दिलीप हिन्दुस्तान पार्क स्थित अपने मकान को देखने गया और वहीं से सीधे कचहरी चला गया। वहाँ वकील के सामने उसकी पेशी हुई। जब उसे दस्तखत करने के लिए कागज़ात दिए गए तो उसने साफ मना कर दिया कि अब उसे मकान नहीं बेचना है। उसने अपना इरादा बदल दिया है।

 उसके चचेरे भाइयों ने इसके बाद उन्हें बहुत समझाया कि बरसों बाद ऐसा ऑफर मिला है कि पुराने मकान के बदले चार- चार फ्लैट और इतना सारा नकद मिल रहा है। फिर उन्हें धमकाया भी गया। बिल्डर ने आकर तरह - तरह के प्रलोभनों से उसे लुभाने की कोशिश भी की परंतु दिलीप अपने निश्चय से न हिला। 

उसके अकेले का 40% शेयर था उस मकान में। अतः उसके दस्तखत के बिना मकान बेच पाना संभव न था। 

और वे कोर्ट से बाहर निकल आए।

उनकी घर वापसी हो चुकी थी। अपनी जन्मभूमि में जब आ गए थे तो कुछ वर्ष वहाँ बीताना चाहते थे।

 उनके सारे दोस्तो भी यही चाहते थे।



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