Moumita Bagchi

Abstract


4.7  

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गढ़वाल पहाड़ों की रानी-"खिर्सू"

गढ़वाल पहाड़ों की रानी-"खिर्सू"

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बात कोई आठ- दस साल पहले की है। जून के महीनों की दिल्ली की चिलचिलाती धूप और भयानक गर्मी की रातों में होने वाली लंबे 'पावरकट' से तंग आकर एकदिन पतिदेव ने कहा, " बहुत हो गया , अब तो! पहाड़ों में जाने का समय आ गया !" 

हम सब किसी ठंडी जगह पर सैर के लिए जाने के लिए बेताब थे। पर जाएँ तो जाएँ कैसे ? एक तरफ मेरा छः महीने का बेटा था तो दूसरी ओर सिर्फ छः महीने पहले एंजियोप्लाॅस्टी के दर्दनाक दौरे से गुज़रे मेरे छियासठ वर्षीय ससुरजी--- एक नाज़ूक आयु के तो दूसरे नाज़ूक दिल के- दोनों का ही विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक था।

पर पतिदेव कहाॅ रुकनेवाले थे? उन्होंने जब एक बार मन बना लिया जाने का तो अब पीछे कदम नहीं हटा सकते थे। किसी का साथ न मिला तो उन्होंने अकेले ही जाने का निश्चय कर लिया। रातोंरात इंटरनेट सर्च कर उन्होंने जगह भी ठीक कर ली थी----उत्तराखंड राज्य में स्थित गढ़वाल प्रदेश में अवस्थित एक अत्यंत ही मनोरम स्थल-नाम है, " खिर्सू"। ठहरने का इंतज़ाम" गढ़वाल मंडल विकास निगम" के अतिथि-गृह में किया गया।

16 जून, शुक्रवार के दिन पतिदेव जल्दी-जल्दी दफ्तर से लौट आए। उन्होने अपने सैंट्रो में हमारा सारा सामान लोड किया और हम चार जने---मेरे ससुर जी, सासु माँ, पतिदेव और मैं (अपने छः महीने के बच्चे सहित)सुबह के नाश्ता के बाद कोई दस बजे दिल्ली से खिर्सू के लिए निकल पड़े।

तकरीबन पाँच घंटे के ड्राइव के पश्चात रात के साढ़े नौ बजे हम कोटद्वार नामक जगह पर पहुँच गए। रात को विश्राम हेतु यहीं पर हमें रुकना था! हम वहाँ के होटल अम्बे में रुक गए थे!

अगलेदिन ( 17जून) सुबह जब हम नाश्ता करके निकलने ही वाले थे कि मेरे पतिदेव के दोस्त सतीशजी, उनकी पत्नी विम्मी, ढाई साल का पुत्र शौर्य, बच्चे की आया सुमन; ये लोग भी हमसे आ मिलें। उन्हें भी हमारे साथ खिर्सू जाना था। हम सबने पहले होटल अंबे में जमकर आलू परांठा, दही, फल आदि से नाश्ता किया फिर कोई ग्यारह बजे के आसपास दो गाड़ियों में सवार होकर इकट्ठे खिर्सू के लिए चल पड़े। 

कुछ दूर तक तो दोनों गाड़ियाॅ साथ-साथ चलती रही। फिर उनकी गाड़ी एकाएक पहाड़ों के बीच गायब -सी हो गई। तभी चढ़ाई शुरु ही हुई थी। हम किनारे पर कुछ देर रुककर उनकी प्रतीक्षा करने लगे। टावर न होने के कारण मोबाइल द्वारा संपर्क करना भी संभव नहीं हो पा रहा था। चिंता के कारण प्रतीक्षा की घड़ी लंबी सी लग रही थी। कोई डेढ़ घंटे के बाद दूर से उनकी गाड़ी आती हुई दिखी तो हमारी जान में जान आई। पता चला कि उनका नन्हा शौर्य और विम्मी मार्ग में कुछ अस्वस्थ हो गए थे जिसके कारण उनको रुक जाना पड़ गया था। शुक्र है, हममें से किसी को माउंटन सिकनेस नहीं था!

बहरहाल, हम सब फिर खिर्सू की ओर चल पड़े और कोई साढ़े तीन बजे के लगभग वहाँ पहुँच सके थे। तब तक सभी के पेट में चूहे दौड़ने लग गए थे। पहाड़ों में भूख भी जबरदस्त लखती है, फिर नाश्ते के बाद से कुछ भी न खाया था हमने!

गनीमत यह हुई कि हमने मार्ग से ही इन लोगों को हमारे आने की सूचना दे दी थी, इसलिए वहाँ पहुँचते ही गरमागरम परांठे और सब्जियाँ तैयार मिलें। ससुरजी को, हालाॅकि, हमने रास्ते में ही खिला दिया था क्योंकि वे ठीक डेढ़ बजे लंच करते हैं और किसी भी परिस्धिति में इस बात पर जौ भर भी विलंब उन्हें मंजूर न था।

खिर्सू गढ़वाल पहाड़ों में लगभग छः हजार फूट की ऊँचाई पर स्थित है। खिर्सू का अतिथि-गृह अत्यंत साधारण-सा था जिसमें हमारे नाम से तीन कमरे पहले ही बुक किए जा चुके थे। यूँ तो अतिथि-गृह की साज-सज्जा बढ़ाई जा रही थी और आधुनिक सुविधाओं से युक्त नए कमरे भी बनवाए जा रहे थे परंतु हमें वह सब देखने को सौभाग्य उस समय न प्राप्त हो पाया था। तब ये गेस्ट हाउस का एक हिस्सा जर्जर हालत में थी और दूसरे भाग में नए कमरे बनवाएँ जा रहे थे!

खाना खाकर थोड़ी देर आराम करने के बाद, ससुर जी और सासु माँ ने जब थोड़ी देर तक लेटने का निश्चय किया तो हम लोग अड़ोस-पड़ोस का जायजा लेने निकल पड़े। अतिथि-गृह के निकट ही एक पार्क था, पार्क तो क्या पूरा जंगल था, जिसमें तरह-तरह के वन्य-प्राणी विचरते थे।

एक 'वाच टावर' भी उसमें बना हुआ था। चलते समय कुछ स्थानीय लोगों ने हमें यह कहकर सावधान किया ,

"कल रात को यहाँ पर एक तेंदुआ निकला था, अतः बच्चों को साथ लेकर पार्क के अंदर दूर तक न जाए।"

साॅझ होने वाली थी, इसलिए विम्मी और मैं , सुमन और बच्चों को साथ लेकर लौट आए। पर दोनों दोस्त एडवेंचर के नशे में झूमते हुए जंगल के अंदर तक घुस गए, हम लोगों की उन्होंने एक न सुनी! शुक्र है ईश्वर का कि थोड़ी ही देर में दोनों सही सलामत वापस आ गए थे!

उस रात, सफर से अत्यधिक थके होने के कारण, हम सब जल्दी ही सो गए। वैसे भी पहाड़ों में रात बहुत जल्दी ही हो जाया करती थी। फिर रात को करने को भी हमारे पास ज्यादा कुछ न था! एक टीवी लगी थी कमरे में उसमें कोई पहाड़ी लोक- गीत सुनते हुए हम लो सो गए थे।

आदत के मुताबिक मेरी नींद सुबह पाँच बजे ही खुल गई। मैं अभी अपने बच्चे के दूध पीलाने के लिए पानी उबाल ही रही थी कि कोई साढ़े पाँच बजे मेरे ससुरजी जोर-जोर से हमें आवाज़ देने लगे। वे पहाड़ों को चोटियों के बीच से होनेवाले सूर्योदय का मनोरम दृश्य हमें दिखाना चाहते थे।

ज्यों ही हम अतिथि- गृह के प्रांगण में पहुचे, सूर्य की सुनहरी किरणें पहाड़ियों के बीच से अपनी सतरंगी छटा बिखेरकर मानों हमारे स्वागत के लिए तैयार थी! दूर हिमालय की सुंदर बर्फीली चोटियाँ सूर्य की किरणों से धूली हुई धूप में झिलमिला रही थी। ऐसा नयनाभिराम दृश्य मैंने पहले कभी न देखा था!

ससुर जी मुझे पहचान कराने लगे- "यह देखो वो पर्वत चोटी-"त्रिशूल" है, और उसके पीछे सिंह के पीठ की आकृति वाली--"नंदा देवी" , और वह दूर जो चोटी हैं न, हाँ वह सबसे ऊँचीवाली-- वह केदारनाथ है!"

ऐसा मनोहारिणी समां उपस्थित हो गया था कि मेरे मुख से अनायास ही कविवर प्रसाद की यह पंक्तियाँ निकल पड़ी थी---

"हिमाद्री तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती।

स्वयंप्रभा सम्मुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती।।"

मैं भी अभी, " कामायनी" की मनु की तरह-- " हिमालय की उत्तुंग शिखरों पर, बैठ शिला की शीतल छाँह" में उन हीम कीरीटों की शोभा में खोई ही पड़ी थी कि अचानक पास में कोई बोल रही थी,

" अरे यह क्या???!!! शेर के पंजे जैसे निशान लगता है कोई !"

यह विम्मी की आवाज़ थी। वह हैरान होकर ज़मीन की ओर ताके जा रही थी ! जैसे ही हम सबने अपना रूख उस तरफ किया तो हम सब भी दंग रह गए!

कल रात को बारिश होने के कारण जमीन अभी तक गिली पड़ी थी और उसी गिली जमीन में शेर के पंजे के निशान जैसा कुछ अंकित था। हमलोग जब और भी निशान ढूंढने की कोशिश करने लगे तो क्या पाते हैं कि हमारे कमरे के बाहर भी कुछ ऐसे ही निशान बने हुए थे!

परंतु यह निशान आकार में शेर के पंजे से कुछ छोटे ही थे। इसका मतलब यह था कि कल रात जब हम बेखबर सो रहे थे तो शेरनुमा कोई जानवर हमपर निगरानी रखे जा रहा था!!

हमारे शोर शराबे से अतिथि-गृह के कर्मचारी भी बाहर निकल आए। तब उन लोगों ने हमें बताया,

"आपके बगलवाले कमरे में जो फौजी अफसर ठहरे हैं न? कल रात उनके कुत्ते को खाने के लिए यहाँ एक तेंदुआ निकल आया था। तेंदुआ के पास पहुँचते ही कुत्ते को उसकी जैसे ही आहट लगी, वह जोर-जोर से भौंकने लगा। उसकी भौंकने की आवाज से हम सब जग गए थे और लाठी लेकर निकल आए थे। हमारे आने की आवाज़ सुनकर तेंदुआ भाग खड़ा हुआ।"

तो यह थी पूरी राम कहानी। पति देव और सतीश जी पछता रहे थे कि इतने करीब से तेंदुए की फोटो लेने का मौका हाथ से निकल गया!

बहरहाल, हमलोग नहा-धोकर कुछ दूर स्थित नागेश्वर मंदिर देखने चले। यह मंदिर लगभग दो कि•मी• की चढ़ाई पर था। सासु माँ अभी ससुर जी को चढ़ाई के कारण वहाँ जाने से मना कर ही रही थी( पहले ही बता चुकी हूँ कि वे दिल के मरीज़ थे), कि , यह लीजिए, वे तो मानो रास्ता दिखाते हुए सबके आगे चल पड़े!

वहाँ, ऊपर पहुँचकर सबका दम फूल गया। परंतु मंदिर के अंदर जाकर अद्भुत शांति मिली। मंदिर तो छोटा-सा शिवालय था। बहुत ही साफ-सुथरा। किसी ने पूजा कर भगवान को फूल भी चढ़ा रखे थे। यह स्थान चारों ओर बड़े-बड़े वृक्षों से घिरा हुआ था और बिलकुल जनशून्य था, जहाँ सिर्फ पक्षियों की कलरव ध्वनि ही सुनाई पड़ रहा था। शहर के शोर-शराबे से दूर शुद्ध ताज़ी हवा का सेवन करने के लिए हम सब थोड़ी देर के लिए वहीं पर रुक गए। बैठने के लिए वहाॅ पर जगह-जगह सीमेंट के चबूतरे भी बने थे। बच्चे भी वहाँ खेलने लगे। मेरे बेटे को और विम्मी के बच्चे दोनों को सुमन संभालने लगी ।

नीचे पहुँचकर हमें भूख लगने लगी थी। परंतु हमने तय किया कि पहले वहाँ से कोई दो-तीन कि•मी• दूरी पर अवस्थित क्योंकालेश्वर जी के दर्शन के उपरांत ही लंच करने चलेंगे। बच्चों और बुर्जगों को साथ लाए हुए स्नैक्स खिला दिए गए। ससुरजी देव-दर्शन हेतु व्यग्र हो रहे थे लेकिन इस बार सासु माँ उन्हे रोकने में कामयाब हो गई। चढ़ाई की ढेर सारी सीढ़ियाॅ देखकर उनका भी उत्साह बिलकुल ठंडा पड़ गया था।

बच्चों को सुमन और सासु माँ के हवाले कर हम चारों ऊपर की दिशा में चल पड़े थे। रास्ते में विम्मी को हील वाले जूते पहने होने के कारण चढ़ाई में तकलीफ होने लगी। तब वह भागकर अपने सैन्डलों को गाड़ी में रख आई। और नंगे पाँव ही हमारे साथ- साथ चल पड़ी!

ऊपर एक बड़ा-सा प्राचीन शिव मंदिर था जिसके एक ओर संस्कृत विद्यालय था। प्रांगण के बीचोंबीच शिवालय अवस्थित था और उसके पीछे एक छोटा-सा ,शायद पार्वती जी का, देवी मंदिर भी था। मंदिर के द्वार पर लगे स्तंभों पर कई प्राचीन एवं सुंदर मूर्तियाॅ खुदे हुए थे जो भगवान कृष्ण के विभिन्न लीलाओं का वर्णन करते थे। एक ओर संस्कृत विद्यालय था और विद्यर्थियों के रहने के घरों की श्रृंखलाएँ बनी हुई थी!

यह सब देखकर और देव- दर्शन के पश्चात हम नीचे गाड़ी में आ गए और लंच के लिए पौढ़ी गए। पौढ़ी का उतार शुरु होते ही ज़ोरों से भूख लगने लगी थी।

पौढ़ी गढ़वाल राज्य की राजधानी है और अब तो जिला मुख्यालय भी है। वहाँ से हम सब रात को अतिथि-गृह में लौट आए थे। श्रीनगर शहर भी पास ही था तो वहाँ से कुछ आवश्यक सामान लेकर अगले दिन हम पुनः दिल्ली के लिए रवाना हो गए। और हमारी इस सुखद पहाड़ी यात्रा का अंत हो गया!

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खिर्सू गए हुए यद्यपि अभी कई वर्ष बीत गए हैं परंतु यह यात्रा आज भी एक यादगार बनकर हमारी जेहन में कहीं चिपकी रह गई है। 


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