Vijaykant Verma

Abstract Tragedy


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Vijaykant Verma

Abstract Tragedy


डेली डायरी 28/03/2020

डेली डायरी 28/03/2020

4 mins 198 4 mins 198

Dear Diary 28/03/2020

सुबह की लालिमा भी काली नजर आने लगती है जब किसी का दर्द आंसुओं का धार बनकर आँखों से बहने लगता है..! लॉक डाउन की वजह से हजारों मजदूर कई सौ किलोमीटर की पैदल दूरी चलकर अपने घर गांव जाने पर मजबूर हुए..! पैरों में छाले पड़ गए फिर भी चलते रहे। कोई साधन नहीं। कोई सवारी नहीं। जेब में पैसा नहीं। खाने को अनाज नहीं। कौन इनका दुख दर्द समझे..? सरकार बैंकों में हजार रुपए डाल रही है! पर इनका बैंक तो इनकी जेब है, और वो भी फटी हुई..! मुझे ऐसी कोई योजना नहीं सुनने को मिली, कि सरकार ने या किसी ने इनके फटी जेब में दो चार नोट भी थमाया हो। सरकार कहती है कि किसी को भूखा नहीं मरने दिया जाएगा। मगर इन थके हारे मुसाफिरों में से कई ऐसे हैं, जिन्होंने दो दिन तक कुछ नहीं खाया। तो प्रश्न यह उठता है, कि सरकार की रोटी किन लोगों के पेट में गई..? सच, इन बेबस लाचार मजदूरों के साथ उनके दुख दर्द में दिल से शामिल हूँ मैं! पर क्या करूँ..! काश, कोई ऐसा तरीका होता, कि मैं भी उनकी मदद कर पाता..! सरकार ने यह भी एलान किया, कि जो जहां है, वहीं रहे। और वहीं उसके रहने खाने की व्यवस्था की जाएगी..! लेकिन हकीकत यही है, कि बहुत बड़े स्तर पर यह मुमकिन नही है। इसलिए इन लोगों को सिर्फ उनके घर भेजने की व्यवस्था ही नहीं की जानी चाहिए थी, बल्कि कुछ नगद धनराशि भी इन्हें दिया जाना चाहिए था, जिससे ये अपने घर पहुंच कर अपने बच्चों को कुछ तो खुशी दे सकते..! और हुआ बाद में कुछ ऐसा ही। जब इन सब के रहने की व्यवस्था न बन पाई, तो इनमें से बहुत से लोगों को बसों में ठूस ठूस इनके घरों में भेजा गया। तब क्या लॉक डाउन नहीं टूटा..? इस संदर्भ में मेरा कहना है, कि किसी भी फैक्ट्री को बंद नहीं करना चाहिए था बल्कि इन फैक्ट्रियों को चलने की इजाजत देनी चाहिए थी, इस शर्त पर, कि फैक्ट्री मालिक उन मजदूरों के वहीं पर रहने और खाने की व्यवस्था करेंगे और फैक्ट्रियों में ही उनको क्वॉरेंटाइन किया जाएगा। इसी प्रकार जो मजदूर घर मकान आदि बनाने के काम में लगे थे, उनको भी काम करने देना चाहिए था और, मोरंग बालू की दुकान खुली होनी चाहिए थी, क्योंकि इन दुकानों पर भी बहुत ज़्यादा लोग नहीं आते और डिस्टेंस रूल को फॉलो करते हुए भी वो अपना काम धंधा कर सकते थे और इससे देश की आर्थिक स्थिति भी इतनी कमजोर ना होती। इसी तरह बसों को भी बन्द कर देना उचित कदम नहीं था। अगर बसें चलती रहतीं, तो जनता कर्फ्यू होने के कारण किसी भी बस में दस बारह सवारियां से ज्यादा न होती और किसी को भी इस तरह पैदल चलने पर मजबूर न होना पड़ता और उनमें आपस की दूरियां भी बनी होती। इस तरह के बहुत सारे विचार मेरे दिमाग में आते जाते रहे और मेरी डेली रूटीन पूरी तरह से बिगड़ गई। न नाश्ता, न पानी और अखबार पढ़ते पढ़ते और इन मजदूरों की दुख दर्द के बारे में विचार करते-करते ही कब दिन के एक बज गए, कुछ पता ही न चला। और इसके बाद मैंने अपना नाश्ता किया। और करीब तीन बजे मैंने खाना खाया। वैसे क्वारन्टाइन के कारण लोगों के घर पर बोर होने के कारण आज से ही दूरदर्शन पर अति लोकप्रिय सीरियल रामायण और महाभारत का प्रसारण भी शुरू कर दिया गया। मुझे अच्छी तरह से याद है, कि अपने समय में जब यह सीरियल प्रसारित होता था, तो गली मोहल्ले में देखने वालों की लाइनें लग जाती थी। लोगों का घर सिनेमा हॉल बन जाता था और सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। मैंने भी अपना टीवी चालू किया, जो कई महीनों से बन्द था। सुबह से शाम हो चुकी थी, लेकिन आज कोई विशेष काम मैं नही कर सका, पर एक दो कविता तो लिखनी ही थी, क्योंकि स्टोरी मिरर का टारगेट भी पूरा करना था। फिर अपने माइंड को कन्सन्ट्रेट कर मैंने कविता लिखी, उसे पोस्ट किया, रामायण देखा, और भोजन करने के बाद डायरी लिखने बैठ गया। और मुझे पता ही नहीं चला, कि कब मुझे नींद आ गई, क्योंकि जब मेरी आँख खुली, तो तारीख बदल चुकी थी। फिर मैंने अपनी डायरी में दो लाइनें और लिख डाला~ अरे अमीरों, असली गरीब तो वो हैं, जिनका कोई बैंक में खाता ही नहीं..! कभी पूछो अपने दिल से, किसी ऐसे गरीब की भी तूने मदद की या नहीं..?


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