Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Abstract


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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दैदीप्यमान सितारा

दैदीप्यमान सितारा

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दैदीप्यमान सितारा ...

इसे संयोग ही कहें, इतने बड़े संसार में, सुनयना एवं मैं लगातार समानांतर एवं साथ साथ चलते आये थे।स्कूल/कॉलेज के वे दिन आज भी, मेरी स्मृति में ताजे हैं।

सुनयना नाम अनुरूप सुंदर ही नहीं, बौध्दिक रूप से विलक्षण लड़की रही थी। वह परीक्षा परिणाम में, अव्वल तो रहती थी।वह, सभी साँस्कृतिक प्रतियोगिताओं एवं मंचन में भी, हिस्सा लेती थी। उनमें, उसका होना, मेरे जैसी लड़कियों को पुरस्कार से, वंचित होना निश्चित कर देता था।

ऐसे हर अवसर पर, पुरस्कृत होते हुए, प्रसन्नता से दमकता, उसका सुंदर मुखड़ा, और ज्यादा ही निखरा हुआ होता था।उस समय मुझे लगता कि, सुंदर से सुंदर परिधानों एवं आभूषणों में सजी धजी, वहाँ विराजित अन्य युवतियों की, चमक दमक उसके सम्मुख, फीकी पड़ जाती थी।

मेरा पूरा ही शैक्षणिक जीवन, उसकी आभा से प्रभावित रहा। कहना उचित होगा कि वह दीपक ज्योत सी प्रकाशित रही और मैं, दीपक के नीचे के अंधकार सी रही थी। 

ऐसे ही, मेरे पुरस्कृत होने की कामना, सदैव अधूरी रहती थी। तब भी मैंने ऐसे आयोजन में भाग लेना बंद नहीं किया था। 

महाविद्यालय में आते आते, यह अवश्य हुआ था कि ऐसे आयोजन में, हिस्सा लेते हुए, मैंने स्वयं को सबसे निचले स्थान पर रखना सीख लिया था। अर्थात, अच्छा प्रदर्शन कर सकने की योग्यता होते हुए भी, ऐसा न करना। 

सुनयना मेरी सहेली थी। वह मेरा मनोबल बढ़ाने वाली बातें कहती थी। मैंने उससे यह राज छिपाये रखा था कि निचले क्रम में दिखने में, मुझे आनंद आने लगा था।  

जब कोई सहपाठी प्रतियोगी, अपने प्रदर्शन से असंतुष्ट होती तब सूची में, अपने नीचे भी, कोई नाम (मेरा भी) देखती तो उसे राहत अनुभव होती थी। उसकी कुंठाओं में कमी का कारण, मुझे, मैं होती सी लगती थी। इस तरह उनकी ख़ुशी के माध्यम होने में, मुझे प्रसन्नता अनुभव होती थी।  

ऐसे समय बीतता गया था। जैसा मैंने लिखा, सुनयना का संयोग, हमारे पूरे जीवन रहा। 

शिक्षा पूर्ण होने के उपरान्त सुनयना और मेरा विवाह, मुंबई आईआईटी से शिक्षित क्रमशः सुरेंद्र एवं उपेंद्र (मेरे पति), से हुआ था। दोनों साथ ही 'भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन' में वैज्ञानिक की तरह कार्यरत थे। और आपस में, मेरे एवं सुनयना के तरह ही, मित्र भी थे। 

विवाहिता हो जाने पर भी, सुनयना अपनी विशिष्टताओं सहित, साहित्य एवं साँस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेती रही थी। 

सुरेंद्र से उसे, घर एवं बाहर मिलते प्रोत्साहन के कारण वह इस क्षेत्र में एक चर्चित नारी होने में सफल रही थी। 

मुझे उसकी ऐसी सफलता पर बहुत ख़ुशी होती रही थी। मुझे सुनयना की सहेली कहलाये जाने में आत्मिक सुख एवं गौरव अनुभव होता था। 

ऐसे ही बीतते गया समय, कल तक आया था। कल, हम सबके जीवन में एक अभूतपूर्व उपलब्धि बन के आया था। 

इस वर्ष के पद्म विभूषण से पुरस्कृत व्यक्तियों की सूची, भारत सरकार ने, कल जारी की थी, जिसमें एक नाम उपेंद्र का भी था। 

इस पर बधाई देने सुरेंद्र और सुनयना, हमारे घर आये थे। हम सभी बैठक कक्ष में, आराम की मुद्रा में चाय आदि के साथ, वार्तालाप का आनंद उठा रहे थे। 

गर्मजोशी से बधाई एवं आभार के उपरान्त हमारी चर्चा यूँ रही थी-

सुनयना : (सुरेंद्र के तरफ इशारा करते और हँसते हुए) भाईसाहब, ये तो मुझे सपोर्ट करते हुए मुझ पर समय लगाने में ज्यादा व्यस्त रहे, अन्यथा आप वाली, अलंकरण सूची में इनका भी नाम होता। 

सुरेंद्र: (हँसते हुए) सुनयना, सही कह रहीं हैं, उपेंद्रमैंने विवाह बाद इनमें, विशेषतायें देखीं तो संकल्प किया कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को अलग रख मैं, इन्हें, इनकी महत्वाकांक्षा अनुरूप बढ़ावा दूँगा।हमारे समाज में नारी दशा सुधारने की आवश्यकता रही है। इस हेतु मैं, इन्हें सफल नारी का उदाहरण जैसा समाज सम्मुख रखना चाहता था। 

मैं सफल रहा हूँ। मुझे दुःख नहीं कि मैं, पद्म विभूषित नहीं किया जा रहा हूँ। मुझे, तुम्हें और सुनयना को सफल व्यक्ति के रूप में देखना, सुख दे रहा है। 

उत्तर मैंने दिया : (सुरेंद्र की ओर देखते हुए) सच कहा भाईसाहब, अगर आपने सुनयना की प्रतिभा को उभरने नहीं दिया होता तो, नारी के साथ अन्याय के दोषी आप होते। निश्चित ही आज के युवाओं के लिए, आपका त्याग, प्रेरणा बनेगा।     

(अपनी बारी आने पर,मितभाषी) उपेंद्र: हमारा देश आज (अपने सीने पर हाथ रखते हुए) जिसे, सफल देख रहा है उसके पीछे (मेरी तरफ ऊँगली उठाते हुए), ये हैं। 

मैंने, इनकी महत्वाकाँक्षा, इनकी डायरी के किसी पृष्ठ पर पढ़ी थी।जिसमें, ये स्वयं को, वह व्यक्ति होता, देखना चाहती हैं, जो दूसरों की ख़ुशी का कारण बन कर, खुश होता है 

अतः प्रकट में यह अलंकरण मेरा है। लेकिन, किसी भी मंच पर, मुझे यह स्वीकार करने में, संकोच नहीं कि पद्म विभूषण की, अधिकारी ये हैं। जिनके, मेरे पीछे होने के कारण, देश को यह सेवा देने में, मैं सफल हो सका हूँ। 

(अचंभित) सुनयना: (अपनी आकर्षक आँखें बड़ी कर, मेरी तरफ देखते हुए) तुम, बचपन से मेरे साथ हो। तुम इतनी गहरी हो कि मैं, तुम्हारी थाह नहीं पा सकी हूँ। सच में, मेरी प्यारी सखी, तुम नारी जगत का, एक दैदीप्यमान सितारा हो।


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