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Mukta Sahay

Abstract


4.5  

Mukta Sahay

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बहती भावनाओं के सेतु

बहती भावनाओं के सेतु

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 पल्लवी और कुशल अभी महीने भर पहले माता-पिता बने हैं। नन्हे बच्चे के आने से उसकी पूरी ज़िंदगी ही बदल गई है। कब सुबह होती है और कब रात बच्चे के साथ इन्हें पता ही नहीं चलता। अधूरी नींद और थके शरीर को नन्हे की एक किलकारी सूकुन से भर देती है। नन्हे इनका पहला बच्चा है इसलिए कुशल की माँ और पापा आए हैं कुछ दिनों तक साथ रहने। 

नन्हे ने इन सभी की ज़िंदगी में ख़ुशियाँ भर दी थी। ऐसे ही एक दिन जब नन्हे को उसकी दादी मालिश लगा रही थीं और पास बैठी पल्लवी इस दृश्य को निहार रही थी। कुछ सोंचते हुए वह कहती है, पता है माँजी जब नन्हे मेरे अंदर आया तो बहुत ख़ुशी हुई थी, पूरे नौ महीने एक एक दिन इसके आने का इंतज़ार किया मैंने और कुशल ने। इस अनोखी ख़ुशी के साथ एक अनूठी बात हुई, नन्हे का आना मुझे अपनी माँ के और क़रीब ले आया। मुझे अनुभव हुआ कि सारी पीड़ा और तकलीफ़ों के बाद भी अपने बच्चे के लिए एक माँ कितनी उत्साहित होती है। मन में उल्लास भरा होता है। ऐसा ही मेरी माँ ने भी महसूस किया होगा ना जब मैं आने वाली रही होंगी । 

अच्छा माँजी ये बताइए कुशल के आने पर आपने भी यही सब अनुभव किया होगा ना। पल्लवी की सास की आँखों ममता से चमक गई और आवाज़ में ममत्व की ललक आ गई। उन्होंने कहा, हाँ बेटा उस अनुभूति को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। कुशल का आने से हमारी  ज़िंदगी ही बदल गई थी। कुशल हमारी ज़िंदगी की धुरी बन गया था जिसके चारों ओर हमारी सारी गतिवधियाँ घूमती थीं। कुशल के पापा तो काम से आने के बाद घंटों कुशल के साथ खेलते रहते थे। कहते हैं ना एक माँ ही दूसरी माँ को समझती है वह इसलिय ही तो कहते हैं। 

पल्लवी ने कहा हाँ माँजी अब मुझे समझ आ रहा है कि क़्यों कहते हैं की माता-पिता का किया कोई कभी चुकता नहीं कर सकता और इसका मोल तभी पता चलता है जब व्यक्ति स्वयं माता-पिता बनता है। 

वहीं पास बैठा कुशल दोनो की बातें चुपचाप सुन रहा था। थोड़ी देर में वह अपने कमरे में आ गया। दोनो महिलाएँ देर तक आपस में अपने अनुभव साझा करती रहीं। इस दौरान नन्हे के काम चलते रहे। मालिश के बाद नन्हे की मस्ती फिर नहाना फिर उसकी पेटपूजा और फिर प्यारी से नींद। अब तक वह सो गया था गहरी नींद में और धीरे धीरे मुस्कुरा रहा था। थोड़ी देर गोदी में रखने के बाद पल्लवी उसे बिस्तर पर सुलाने के लिए उसी कमरे में आई जिसमें कुशल बैठा था। 

पल्लवी ने देखा कुशल कुछ सोच में खोया सा था। पल्लवी ने कुशल से पूछा क्या हुआ, ऐसे क्यों बैठे हो। कुशल ने कहा "आओ बताता हूँ। मैंने तुम्हारी और माँ की बातें सुनी और उसे सुन कर मन बड़ा व्यथित हो गया।" पल्लवी ने पूछा "ऐसा क्या हो गया है?" कुशल ने बोलना शुरू किया," मैं एक पायलेट बनना चाहता था। पापा से बताया तो उन्होंने कहा अच्छे से पढ़ और एन॰ डी॰ ए॰ की परीक्षा पास कर ले तो बन जाएगा। कोमेर्शियल पायलेट बनाने के लायक़ पैसे मेरे पास नहीं हैं। मैंने बहुत मेहनत भी की एन॰ डी॰ ए॰ की परीक्षा पास करी, फिर एस॰ एस॰ बी॰ भी उत्तीर्ण किया किंतु पैर की कुछ ख़ामी की वजह से मेरा मेडिकल सफल नहीं हुआ और मैं पायलेट बनते बनते रह गया। मैंने पापा से फिर कोमेर्शियल पायलेट की पढ़ाई के लिए कहा पर उन्होंने फिर से माना कर दिया। मैंने इंजिनीरिंग की पढ़ाई शुरू कर दी। कुछ दिनो बाद जब छोटी की शादी तय हुई और पापा ने उसकी शादी पर लाखों खर्च करें तो मुझे अच्छा नहीं लगा । छोटी की शादी के बाद मैंने पापा से कहा अभी आपके पास लाखों रुपय आ गए और जब मैंने कोमेर्शियल पायलेट की पढ़ाई के लिए माँगे थे आपने माना कर दिया था। आप नहीं चाहते थे कि मैं अपनी पसंद का काम करके नाम और पैसा दोनो कमाऊँ, बड़ा आदमी बनूँ। और ना जाने क्या क्या कहा था मैंने पापा को। इसके बाद मैंने पापा से बहुत ही कम बात की है, माँ तो माँ है पर वह भी बहुत सोंच समझ कर ही मुझसे बात करती है। वह शारीरिक कमी जिस के कारण मेरा एन॰ डी॰ ए॰ का मेडिकल सही नहीं हुआ था,  शायद वह मेरे कोमेर्शियल पायलेट की पढ़ाई के राह में भी आता। इसका अहसास मुझे आज हो रहा है।  

तुम दोनो कह रहे थे ना माता-पिता बनने पर ही उनके दर्द को , प्यार को महसूस किया जा सकता है, अभी मैं भी वही महसूस कर रहा हूँ। आज जैसे नन्हे के सारे काम करने में मुझे आंतरिक ख़ुशी मिलती है वैसे ही तो पापा ने भी निस्वार्थ भाव से मुझे पाला होगा। कितनी पीड़ा हुई होगी उस दिन उनको मेरे व्यवहार से फिर भी मेरी हर ज़रूरत पर साथ खड़े हो जाते हैं। मेरी हर ख़ुशी को बढ़ाने को तत्पर रहते हैं। आज मैं समझ पाता हूँ कि कोमेर्शियल पायलेट की पढ़ाई कराना सच में पापा के लिए मुश्किल था। घर में नौ सदस्य थे जिनमे पाँच बच्चे और दो बुजुर्ग शामिल थे। बच्चों की पढ़ाई और बुजुर्गों की दवाई सब अकेले पापा की आय पर ही निर्भर थे। पल्लवी बड़ी ग्लानि हो रही है अपने किए पर" बोलते बोलते कुशल रुआँसा हो गया। 

पल्लवी ने उसे सम्भालते हुए कहा "जब आँखे खुली तभी सवेरा। अब भी कुछ  बिगड़ा नहीं है माफ़ी माँग लो अपने माता-पिता से। तुम तो भाग्यशाली हो की माता-पिता अभी तुम्हारे पास है। कितने लोग तो ऐसे होते हैं कि जब तक वह इस बात को समझ पाते हैं तब तक उनके पास माफ़ी माँगने का भी समय नहीं रह जाता है। माता-पिता दुनिया में ही नहीं होते है। जितनी जल्दी हो सके अपने माँ के भाव माँ-पापा को बता दो। उन्हें अच्छा लगेगा और तुम्हारा मन भी हल्का होगा।" 

कुशल तुरंत ही उठ कर माँ के कमरे में जाता है और अपनी माँ का हाथ पकड़ कर बैठ जाता है। बहुत समय, यूँ कहे कि सालों बाद कुशल ने माँ के हाथ ऐसे पकड़े थे। माँ बेटे की नज़रें मिलीं और हाथों के बीच की पकड़ और मज़बूत हो गई। इसके साथ ही माँ और बेटे दोनो की आँखें नम हो गईं । किसी ने कुछ भी नहीं बोला लेकिन खामोशी ने अपना काम कर दिया। माँ और बेटा देर तक भावविह्वल एक दूसरे का हाथ पकड़े बैठे रहे। थोड़ी देर में कुशल के पापा भी अख़बार पढ़ का कमरे में अपनी दवा लेने आते हैं। माँ बेटे को ऐसे बैठा देख पास ही बैठ जाते हैं। कुशल को तो अपने पिता से बहूत कुच कहना था, कितनी ही बातों की माफ़ी माँगनी थी लेकिन उसकी आवाज़ ने साथ नहीं दिया। वह कुच भी बोल ही नहीं पाया। बस अपने पिता के गोद में अपना सर रख कर कुछ कहना चाहा पर उसके पापा ने उसे  चुप करा दिया । माता-पिता बरसों बाद मिले अपने बेटे को नम आखों से निहार रहे थे और उनके हाथ कुशल के सिर को प्यार से सहला रहे थे। माता-पिता और बेटे की बहती हुई भावनाओं में सारे पश्चाताप और दुःख बाहर निकले जा रहे थे। 

पल्लवी कमरे के दरवाज़े पर खड़ी इस मार्मिक दृश्य को देख सोच रही है कि सच में माता-पिता बन कर ही हम माता-पिता को सही तरीक़े से समझ पाते हैं। काश जितने भी रिश्ते राह भटक गए है, ऐसे ही अपनो से मिल जाएँ तो कितना अच्छा है। नन्हे के आने से ना ही पल्लवी और कुशल के जीवन में ख़ुशहाली आई है बल्कि कुशल के माता-पिता को भी अपना खोया बेटा वापस मिल गया है।



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