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Mukta Sahay

Others


4.5  

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श्रुति और उसकी सहेलियाँ – दीवारें (भाग-3)

श्रुति और उसकी सहेलियाँ – दीवारें (भाग-3)

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“चलो उठो भी श्रुति, देखो तो कितनी सुंदर सुबह है। ऐसी सुबह तो मैंने सिर्फ़ फ़िल्मों – फ़ोटो में ही देखी है बल्कि वे भी ऐसी नही होती हैं। समर उठो ना चलो ना बाहर चलते हैं”, सीमा ने पूरे उत्साह से, एक ही साँस में सब बोल डाला। उसके बोलने की चंचलता से उसके उत्साह और कौतूहल का पूरा आभास हो रहा था। फिर भी श्रुति और समर ने धीरे से आँखे खोली और करवट बदल कर फिर से सो गए।


सीमा उन्हें सोता छोड़, अकेले ही बाहर निकल आई। रात की बारिश के बाद की, पहाड़ के इस ऊँची पर उगते सूरज की सुनहरी लालिमा और निश्चल गिरते झरने के कलकल के साथ पक्षियों की कलरव, सचमुच अदभूत था। सीमा इन सारे पल के हरेक क्षण को अनुभव करना चाहती थी और सारे नज़ारे को अपने आँखों में क़ैद कर लेना चाहती थी। पर बार बार माँ कहता कि श्रुति और समर भी साथ होते तो अनुभव और भी ख़ास होते। वह फिर अंदर गई और दोनो को उठा कर बाहर लाने की कोशिश में जुट गई, लेकिन दोनो की नींद पर कोई असर नही हुआ। सीमा थोड़ी झुंझला सी गई, समर को नींद में भी सीमा के खीझ का अहसास हो गया इसलिए वह आँखे मालता हुआ, अनमने ढंग से उठ गया और मन ना होते हुए भी खुद को खिचता हुआ, सीमा के साथ बाहर आया। बाहर निकलते ही उसकी पूरी नींद ही उड़ गई क्योंकि नज़र ही ऐसा था। वह भी पूरे उत्साह से इस नज़ारे को निहारने लगा।


समर और सीमा इन हसीन सुबह को निहारते निहारते पुजारी के घर से थोड़ी दूर तक निकल आए थे, जहां पर झरने का पानी गिरता था। वही पास में एक बड़े चट्टान पर बैठ गए। बातें करते हुए दोनो को श्रुति की कल वाली बात पर चिंतित होने लगे। उन्हें समझ ही नही आ रहा था की आख़िर श्रुति कह क्या रही है और वह क्या सोंचती है। कही ऐसा तो नही की वह जो किताबें पढ़ती है और फ़िल्में देखती है उसका असर उसके सोंच, उसकी कल्पना पर तो नही होने लगा है। अब जब माँ डॉक्टर हो तो माता-पिता का ऐसा सोंचना तो बहुत हद तक सही है। कई बार उन्हें ऐसा भी लगा की कहीं उनकी देख-रेख में कोई कमी तो नही रह गई। इस चट्टान पर बैठे, बातें करते समर-सीमा को आधे घंटे से ऊपर हो गया था, तभी पुजारी जी के लड़के की आवज आई “ अरे साहब आप-लोग यहाँ है, मैं तो आपको बहुत दे से ढूँढ रहा हूँ, मुझे लगा कि कही आपलोग रास्ता तो नही भटक गए”। समर ने हंसते हुए कहा, नही नही यहाँ की ख़ूबसूरती ही ऐसी है कि समय कब निकल गया पाता ही नही चला। श्रुति उठी या की नही, सीमा ने पूछा। पुजारी के लड़के ने कहा पता नही मैं तो बहुत देर से आपको ढूँढ रहा था, पहले मैं दूसरी तरफ़ गया था क्योंकि उधर का रास्ता सरल है सो लगा आप दोनो उधर ही गए होंगे, इस तरफ़ थोड़ी चढ़ाई है और चट्टाने भी ज़्यादा है। पर आपलोग तो इस तरफ़ निकल आए थे।


तीने फिर वापस, पुजारी के घर की तरफ़ बढ़ गए। क्रमशः


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