Yashwant Rathore

Abstract Inspirational


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Yashwant Rathore

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भोग

भोग

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यहां जो बात हो रही है वो सिर्फ उन लोगों के लिए है जो आध्यात्मिकता के विचारों में उलझे है। जो इसमें नहीं उलझे उनके लिए यह बात ठीक नहीं बैठेगी। वो ना ही पढ़े तो बेहतर है नहीं तो अर्थ का अनर्थ ही निकलेगा।


शंकराचार्य के बारे में कहते हैं कि छह बरस की उम्र में ही सन्यासी हो गए। नि :संदेह उनकी पूर्व जन्म की साधना रही होगी। उनके लिए संसार भोग में कोई रुचि संभव ही न हो। उनको रस ही ध्यान अवस्था में मिलता हो।


लेकिन अभी जो युवा हैं वो नकल कर रहा हैं उनकी, उसकी कोई साधना ही नहीं। वो उदासीन होके बैठा है। आधी दुनिया को समझने की, देखने की ,जानने की रुचि ही नहीं। उसने अपने मन में गलत सही बांट रखा हैं।

अपने आप को वीतरागी समझ रहा है क्योंकि नारी की तरफ नज़र नहीं और नशा वो करता नहीं। उसके अनुसार वो अच्छे मार्ग पर हैं। उसे लगता है वो कामी और भोगी नहीं।

पर महापुरुषों का कथन है जीवन मे कुछ भी त्याग करने की जरूरत नहीं  बस ध्यान पकड़ लीजिए. जैसे जैसे ध्यान बढ़ेगा, जो बेकार हैं स्वतः ही पीछे रह ही जायेगा.

जिसको लगता है वो भोगी नहीं, कामी नहीं वो नकल मात्रा ही कर रहा हैं। भोग और कामनाएं रहती है है जब तक कैवल्य की प्राप्ति न हो। जैसे

मोबाइल में समय देना मोबाइल का भोग हैं। स्वादिष्ट खाने का सुख भी भोग हैं। टीवी से मनोरंजन करना भी भोग है।  

अच्छे कपड़े पहनना भी भोग है। यहां तक कि तैरने का आनंद लेना भी भोग है आदि आदि। पर हमें ये भोग नहीं लगते। क्योंकि इसमें कोई दूसरा आप पे उंगली नही उठा सकता कि आप गलत हो। हमें सिर्फ स्त्री से अच्छी बातें करना, सिर्फ दोस्ती रखना भी भोग नहीं लगता। बस हम बिस्तर होना ही भोग लगता हैं। भगवान की कामना भी कामना नहीं लगती।


लेख का अर्थ बिल्कुल भी नहीं की आप लंगोट से ढीले और नशेड़ी हो जाए। बात है सिर्फ धुंध हटाने की, साफ देखने की।

इंसान को संयमित होना ही चाहिए। वो senses ( इन्द्रिय) का स्वामी हैं, गुलाम नहीं। यह बल उसे विकसित करना ही चाहिए। नहीं तो एक गुलाबजामुन भी डायबिटीज वाले को मार गिराता हैं।

पर साफ देखना जरूरी है न कि अपने को धोखे में रखना।

अपनी कोई भी हरकत ,दूसरे के दुख का कारण न बने, इतनी समझ तो होनी ही चाहिए। लेकिन जब जिंदगी हँस के मिले, आपके साथ में नाचने गाने आये तब हृदय के दरवाजे व आंखें बंद न कीजिये।


बस इतना ही। । ।



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