Deepika Kumari

Action Inspirational


4.8  

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बापू जी का अधूरा सपना

बापू जी का अधूरा सपना

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देश को अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों से आजादी दिलाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी, मानवता की एक ऐसी मिसाल हैं कि उनका जीवन हर किसी को प्रेरित करता है। बहुत से लोग तो उनके इतने दीवाने हैं कि उन्हें ईश्वर समझकर उनकी पूजा करते हैं परंतु गांधीजी थे तो एक साधारण इंसान ही और प्रत्येक साधारण व्यक्ति की तरह वे भी अपना जीवन साधारण ढंग से ही जीते थे। जिस प्रकार एक साधारण इंसान दिन भर काम करने के बाद रात को विश्राम करता है और मीठी नींद में अपने सपनों की दुनिया में खो जाता है, हमारे बापू जी भी हम जैसे ही थे। हमारी तरह ही वे भी सपने देखते थे। परंतु वे रात को गहरी नींद में आए सपनों को महत्व न देकर दिन में जागती हुई आंखों से देखे जाने वाले सपनों को महत्व देते थे क्योंकि यह जरूरी नहीं की नींद में आए सपनों का सदैव कोई उद्देश्य ही हो और बिना किसी उद्देश्य के देखे जाने वाले सपने निरर्थक और व्यर्थ होते हैं। हमारे बापू जी भी सपने देखते थे,खुली आंखों से अपने लिए नहीं अपने देश के लिए। एक सच्चे देशभक्त की यही तो पहचान होती है कि वह अपने लिए कुछ नहीं सोचता। वह जब भी सोचता है केवल अपने देश के लिए ही सोचता है। वह निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर समाजहित, राष्ट्रहित के चिंतन में ही सदैव लीन रहता है। ऐसे ही देशभक्तों में से एक थे हमारी बापूजी। 

बापू जी ने अपने सपनों की दुनिया में अपने देश के लिए अनेक सपने संजोए थे। अपने देश के लिए देखें अनेक सपनों में से उनका एक सपना था- साफ, सुंदर व स्वच्छ भारत का। दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने के बाद जब वह अपने देश लौटे तो उन्होंने अपने देश की स्वच्छता की तुलना विदेश से की और इस तुलना में उन्होंने अपने देश को बहुत पिछड़ा हुआ पाया और उन्होंने यह निर्णय लिया कि वे अपने देश को विदेशों से भी साफ व सुंदर बनाने के लिए पूरा प्रयास करेंगे। अपने अधिकांशतः अशिक्षित ,ग्रामीण व पिछड़े देश को स्वच्छ व सुंदर देश बनाने का सपना देखना जितना उन्हें आसान लगा उतना ही कठिन था भारतीयों की वर्षों से चली आ रही पारंपरिक व रूढ़िवादी सोच को बदल कर उसे स्वच्छता की ओर अग्रसर करना। पर हमारे बापू जी एक बार जिस राह पर चलने की ठान लेते थे तो मंजिल पर पहुंचने के बाद ही दम लेते थे।देखना यह था कि बापू जी ने स्वच्छ भारत के जिस सपने को अपनी आंखों में संजो लिया है क्या वे उसे वास्तविकता के धरातल पर उतार पाएंगे ? 

उस समय साफ सफाई का काम करने वालों को 'अछूत' समझा जाता था और उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता था। बापूजी हिंदुओं की इस रूढ़िवादी सोच को स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने सफाई को छुआछूत के साथ जोड़ने के विचार का खंडन किया। गांधी जी को यह बात बहुत ही अनुचित लगी कि सफाई के काम को समाज में गिरी नजर से देखा जाए। उन्होंने लोगों की इस सोच को बदलने के लिए स्वयं झाडू उठाकर गली-गली सफाई अभियान शुरू किया। उनका कहना था कि सफाई करना किसी निश्चित व्यक्ति या जाति का काम ना होकर सभी का काम होना चाहिए। उनके अनुसार 'हर कोई खुद में ही एक सफाई कर्मी होना चाहिए।'

सफाई और स्वच्छता को लेकर गांधीजी को व्यक्तिगत रूप से खुद कई बार सफाई करते हुए देखा गया था।उनका ऐसा ही एक कार्य 1915 में देखने को मिला था , जब वह हरिद्वार के कुंभ मेले में भाग लेने के लिए गए थे। वह वहां एक तीर्थयात्री नहीं बल्कि सफाई के उद्देश्य से एक स्वयंसेवक के रूप में गए थे। जब वे वहां पहुंचे तो पवित्र गंगा में डुबकी लगाने आए हजारों भक्तों की पवित्र भावना से काफी खुश थे लेकिन जब उन्होंने उन्हीं लोगों द्वारा उसी गंगा नदी की पवित्रता को दूषित करते हुए देखा तो वे बहुत ही परेशान हो गए। जब वहां से लौटे तो पवित्र गंगा नदी को लेकर लोगों के रवैए को देखकर उन्होंने कहा, " मैं पूरी आशा और श्रद्धा से वहां गया था लेकिन जब मैंने पवित्र गंगा और हिमालय की भव्यता को महसूस किया......... इस पवित्र स्थल पर लोग जो कर रहे थे वह देखकर मैं ज्यादा प्रेरित ना हो सका।मैं इतना परेशान हो गया कि मैं शारीरिक और मानसिक रूप से बिल्कुल पागल हो गया....... इस पवित्र नदी का अपमान वह भी धर्म के नाम पर। बेपरवाह जाहिल पुरुष और महिलाएं प्राकृतिक क्रियाओं के लिए इस पवित्र नदी के तट का उपयोग करते हैं, जहां उनसे शांति से बैठकर भगवान की तलाश करने की उम्मीद की जाती है। वे धर्म, विज्ञान और स्वच्छता के नियमों का उल्लंघन करते हैं।"

'क्विट इंडिया और क्लीन इंडिया' का संदेश देने वाले बापू जी का मानना था कि भारत में फैलने वाली अधिकतर महामारियों का कारण है यहां पाई जाने वाली गंदगी। उस गंदगी में से एक जो बीमारियों के फैलने का मुख्य कारण थी वह थी- भारतीय लोगों की खुले में शौच करने की आदत। अनेक बीमारियां इसी आदत के कारण पनपती थी। बापूजी ने लोगों की इस आदत को दूर करने के अनेक प्रयास किए। भारतीयों की गंदी आदतों की ओर इशारा करते हुए गांधी जी ने शौचालयों में सफाई रखने पर बल दिया और लिखा भी। उनके लेखों का एक अंश यहां उद्धृत है-

"मुझे एक बिंदु पर अपना बचाव करना होगा, जिसका नाम है- शौचालय सुविधाएं। मैंने करीब 35 साल पहले सीखा था कि शौचालय को बैठक कक्ष की तरफ स्वच्छ होना चाहिए। यह मैंने पश्चिम से सीखा था मेरा मानना है कि शौचालयों में स्वच्छता के बारे में पूर्व की तुलना में पश्चिम में नियमों को अधिक स्पष्ट रूप से देखा जाता है। हमारी कई बीमारियों की वजह हमारे शौचालयों की स्थिति और हमारी किसी भी जगह पर मल मूत्र करने की बुरी आदत है इसलिए मैं जरूरत पड़ने पर मल मूत्र त्यागने के लिए पूरी तरह से साफ सुथरी जगह की आवश्यकता में भरोसा करता हूं। मैंने खुद को इसका आदी बना लिया है और चाहता हूं कि सभी लोगों को ऐसा ही करना चाहिए।"               

गांधीजी जानते थे की स्वच्छता और सफाई की स्थिति भारत में वास्तव में अच्छी नहीं है और ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त शौचालय की कमी के लिए उतने ही प्रयास किए जाने चाहिए जितने स्वराज्य प्राप्त करने के लिए। उन्होंने आगे कहा कि, " जब तक हम लोग अपनी गंदी आदतों से छुटकारा नहीं पा जाते और शौचालय में सुधार नहीं कर लेते तब तक स्वराज्य का कोई महत्व नहीं हो सकता।"

अपने सपने को पूरा करने के लिए गांधीजी को किन किन राहों से होकर गुजरना पड़ा, इसका एक उदाहरण हम उनकी कही इन बातों से समझ सकते हैं, " मैंने देखा कि मैं जनता को सफाई के प्रति उनके कर्तव्यों को इतनी आसानी से नहीं गिना पा रहा था जितनी आसानी से उनको उनके अधिकारों के बारे में बता रहा था। कुछ जगहों पर तो मेरा तिरस्कार भी किया गया , पर कुछ जगहों पर मुझे विनम्र उदासीनता मिली।अपने आस-पड़ोस को साफ रखने के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना बहुत ही ज्यादा कठिन था। इस काम के लिए लोगों से पैसों की उम्मीद रखने का तो कोई सवाल ही नहीं था। इन अनुभवों से मुझे पहले से कहीं बेहतर सबक मिला कि असीमित धैर्य के बिना लोगों से कोई भी काम करवाना असंभव था।"

जिस असीमित धैर्य की गांधी जी ने ऊपर बात की,उसकी एक घटना यहां दी गई है। बात उन दिनों की है जब बापू वर्धा से सेवाग्राम चले गए थे। वहां उन्होंने आसपास के ग्रामीणों से संपर्क करना आरंभ कर दिया। वह रोजाना उन लोगों को सफाई का महत्व बताते और नियमित रूप से वहां सफाई भी करते। कभी वहां की गलियों में झाड़ू लगवा देते तो कभी गांव के धूल से भरे गंदे बच्चों को स्नान कराते। यहां तक की बापू उनके गंदे कपड़ों को भी खुद अपने हाथों से धोने में भी संकोच नहीं करते थे। ऐसा करते हुए बापू को 3 महीने हो गए। लेकिन वहां के लोगों में स्वच्छता और सफाई के प्रति कोई लगाव नजर नहीं आया। वहां के बच्चे मेले कुचले कपड़ों में ही घूमते रहते थे। बापू के साथ आए कार्यकर्ता यह सब देख रहे थे। एक दिन उनके एक कार्यकर्ता ने कहा, " बापूजी, आपको इन लोगों की सेवा करते हुए 3 महीने बीत गए पर कोई परिणाम दिखाई नहीं देता। अपनी सफाई तो छोड़ो ये लोग अपने बच्चों को भी साफ सुथरा नहीं रखते। वे गंदा पहनते हैं, गंदा खाते हैं। यदि आपने साफ कपड़े पहना दिए या अच्छा भोजन करा दिया तो ठीक वरना वे गंदगी में ही पड़े रहेंगे, वैसे ही खाएंगे। उन्हें तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।"             

कार्यकर्ता की बात सुनकर बापू बोले, " बस इतने में ही धैर्य खो दिया।अरे भाई , जिन ग्रामीणों की हम सदियों से उपेक्षा करते आए हैं। उनकी कुछ वर्षों तक तो निस्वार्थ सेवा करनी ही होगी। आपको धैर्य से काम लेना होगा। नवनिर्माण में किसी चमत्कार की आशा नहीं करनी चाहिए। आज भले ही स्वच्छता के प्रति उनके मन में उपेक्षा का भाव है पर एक दिन ऐसा जरूर आएगा , जब सफाई इनके जीवन का अंग बन जाएगी।"

कार्यकर्ताओं ने गांधी जी की बात पर अपनी सहमति दिखाई और वे पूरी निष्ठा और नव निर्माण का सपना संजो कर वहां सफाई अभियान में जुट गए।इसी का नतीजा रहा कि कुछ दिनों बाद उसका सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगा। सेवाग्राम के लोगों ने ना सिर्फ स्वच्छता के महत्व को समझा बल्कि इसे अपने जीवन में भी उतार लिया। 

बापूजी ने स्वराज्य के लिए संघर्ष करते हुए सफाई, स्वच्छता और कचरे के प्रभावी प्रबंधन के लिए अपना संघर्ष जारी रखा। बापूजी का स्वराज का सपना तो पूरा हो गया लेकिन स्वच्छ भारत का उनका सपना उनकी हत्या के साथ ही अधूरा रह गया। आज आजादी के इतने साल बाद भी हम अपने देश को साफ व स्वच्छ बनाने के लिए संघर्ष ही कर रहे हैं। बापू जी के सपने को हम अभी तक भी पूरा क्यों नहीं कर पाए ? यह बात हमें ही सोचनी है।


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