Deepika Kumari

Inspirational Action


4.5  

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गुल्लक का रहस्य

गुल्लक का रहस्य

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वैभव एक सरकारी कर्मचारी है । वह एक ईमानदार, मेहनती और स्वभाव से परोपकारी व्यक्ति है । उसके मध्यमवर्गीय परिवार में दो बेटियां और एक बेटा है। उसकी एक आमदनी से उसके परिवार का खर्च ठीक-ठाक चल रहा है पर उसकी एक आदत उसकी पत्नी की समझ में कभी नहीं आती। वह रोज छोटे बच्चों की तरह मिट्टी के बने गुल्लक में कभी एक , कभी दो तो कभी 5 के सिक्के डालते रहता था। जब भी रमा में उससे यह पूछने की कोशिश करी, कि गुल्लक में डाल रहे पैसे आखिर किसके लिए हैं, वह कोई उत्तर ना देता। वैभव की पत्नी रमा कंजूस प्रवृत्ति की स्त्री थी । वह एक भी पैसा व्यर्थ नहीं करने के ऊसूल पर चलती थी। वैभव रमा की इसी प्रवृत्ति के कारण उसे आधी बातें बताता ही नहीं था। गुल्लक में जमा होने वाले पैसों का रहस्य रमा के मन को सदैव कचोटता रहता था।

एक दिन रमा से रहा न गया। उसने गुल्लक के रहस्य को जानने का दृढ़ संकल्प कर लिया। वह गुस्से में वैभव के पास जाती है और पूछती है, "आखिर तुम मुझे बताते क्यों नहीं कि यह गुल्लक में जमा होने वाले पैसे हैं किसके लिए? क्या तुमने दूसरी शादी कर रखी है या करने वाले हो? क्या मेरी सौत के लिए यह पैसे जोड़ रहे हो? दो गुल्लक पूरी भर गई और अब यह तीसरी गुल्लक है । तुम्हारी पत्नी होने के नाते यह जानना मेरा अधिकार है और तुम मुझे मेरे अधिकार से वंचित नहीं कर सकते।"

रमा की बातें सुनकर वैभव मुस्कुरा देता है और कहता है, "प्रिये, यह रूपए हमारे लिए ही हैं चिंता मत करो।"

रमा, " हमारे लिए है तो मुझे दो । मेरे पास साड़ी नहीं है। मुझे साड़ी खरीदनी हैं।"

वैभव, " बस इतनी सी बात थी तो पहले क्यों नहीं बताया। यह लो बताओ कितने रुपए चाहिए? वैभव अपने पर्स से कुछ रुपए निकालकर रमा की और करता है।

रमा, " नहीं, यह रुपए नहीं चाहिए। मुझे गुल्लक के ही रूपए चाहिए।"

वैभव, " पर उनका तुम क्या करोगी? मैं तुम्हें पैसे दे तो रहा हूं । यह रख लो जो चाहे ले लो।"

रमा, " मुझे नहीं पता था कि तुम झूठ भी बोलते हो। तुमने अभी कहा कि ये गुल्लक के रूपए हमारे लिए ही है और अब जब मैं इन्हें मांग रही हूं तो तुम इन्हें मुझे दे भी नहीं रहे हो।"

वैभव, " नहीं, मैंने झूठ नहीं कहा। पर तुमने मेरी पूरी बात सुनी ही नहीं। मेरे कहने का मतलब यह था कि यह बचत उस समय के लिए है जब हमें इनकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी। देखो रमा जरूरी नहीं कि जीवन सदा एक सा ही रहे। जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं ।आज सुख के दिन है तो क्या पता कल कहीं दुख या मुसीबत आन पड़ी तो उस समय के लिए भी तो हमें कुछ पैसे बचा कर रखने चाहिए ना ।"

रमा, " लेकिन उसके लिए तो तुमने बैंक में पीपीएफ अकाउंट खुलवा रखा है और पोस्ट ऑफिस में भी अकाउंट खुलवा रखा है। फिर यह बचत किसके लिए हो रही है ?"

वैभव, " तुम भी मुझ पर अनावश्यक ही शक करती हो। एक दिन वक्त आएगा तो तुम खुद देख लेना कि यह बचत किसके लिए है । यह बचत हमारे परिवार के सदस्यों के लिए ही है। क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है।"

वैभव की बातें सुनकर रमा कुछ शांत हो जाती है पर उसके मन को अभी भी तसल्ली नहीं मिलती।कुछ महीने बीत जाते हैं । रमा देखती है वैभव कुछ दिनों से ऑफिस नहीं जा रहा । रमा परेशान होकर पूछती है , "क्या बात है आज तीसरा दिन है । तुम काम पर क्यों नहीं जाते ?"

वैभव," तभी तो मैं कहता हूं कि टेलीविजन पर नाटक के अलावा थोड़ा बहुत समाचार भी देखा करो। कोरोना के कारण पूरे देश को लॉकडाउन कर दिया गया है ।"

रमा, " तो क्या अब तनख्वाह नहीं मिलेगी ?"

वैभव, " तुम्हें तो हर वक्त पैसे की ही सूझती रहती है। तनख्वाह क्यों नहीं मिलेगी भला । हां एक दिन की तनख्वाह जरूर कटेगी।"

रमा , "क्यों ?"

वैभव , "सरकार संकट के इस समय में हमारे गरीब भाइयों और मजदूरों की सहायता करने के लिए हमारी तनख्वाह में से एक दिन की कटौती कर रही है ताकि जरूरतमंदों की सहायता कर सके।"

रमा, " आग लगे सरकार को। क्या हमीं के पेट से सबका पेट भरेगी ।"

वैभव, " कैसे बातें करती हो तुम। इस समय तो हम सब का कर्तव्य है कि हम खुद भी जरूरतमंद और गरीब बंधुओं की सहायता करें । रमा तुम सिर्फ अपने बारे में ही सोचती हो इंसान को इतना भी खुदगर्ज नहीं होना चाहिए।"

रमा , "कोई जरूरत नहीं है किसी की मदद करने की। एक दिन की तनख्वाह दे तो दी अब और कुछ लुटाने की कोई आवश्यकता नहीं है। "

एक सुबह रमा दौड़ते हुए वैभव के पास आती है और कहती है, " अजी सुनते हो लगता है हमारे घर में चोरी हो गई है ।"

वैभव डर जाता है और हड़बड़ाहट में पूछता है , "क्या ,कब ,कहां ,क्या चोरी हुआ?"

रमा, " और कुछ तो नहीं पर तुम्हारी तीनों गुल्लक अपनी जगह पर नहीं है।"

वैभव कुछ राहत की सांस लेकर कहता है , "अरे तुमने तो मुझे डरा ही दिया। कोई चोरी नहीं हुई वह तो मैंने कहा था ना तुमसे की जरूरत के समय में काम आएंगे ।आज वह समय था तो मैंने उन पैसों को काम में ले लिया ।"

रमा चौंकते हुए, " किस काम में?"

वैभव, " मैंने तीनों गुल्लक तोड़ दी। करीब 4000 इकट्ठे हो गए थे।"

रामा खुश होकर बोली, " चलो एक कूलर खरीद लाते हैं।"

वैभव , "पर अभी तो लॉकडाउन चल रहा है। सभी मार्केट बंद है और फिर हमारे पास तो एक कूलर पहले से ही है फिर दूसरे की क्या जरूरत है।"

रमा, " जरूरत तो है हम सबको एक ही कमरे में सोना पड़ता है। हम बत्तियां बंद कर देते हैं और दीपू की पढ़ाई हो नहीं पाती। वह देर रात तक पढ़ता है । दूसरे कमरे में दूसरा कूलर लगा देंगे तो वह अपनी पढ़ाई दूसरे कमरे में रात भर कर सकता है।"

वैभव, " ठीक है तो हम अगले महीने दूसरा कूलर ले लेंगे।"

रमा , "पर गुल्लक के पैसे है कहां?"

वैभव , "वह तो मैंने दे दिए ।"

रमा, " किसको दे दिए?"

वैभव, " दिनेश और गुड्डू को ।"

रमा चौंकते हुए कहती है, "क्या, तुमने4000 सफेदी वाले और बिजली वाले को दे दिए?"

वैभव, " हां, आज वह दोनों आए थे उधार मांगने के लिए। लॉकडाउन में उन्हें काम नहीं मिल रहा था। उनके पास राशन कार्ड भी नहीं था जो सरकारी राशन मिलता तो मैंने वह पैसे उन्हें दे दिए।"

रमा, " उधार ही तो दिया है ना। वे लोग वापस तो दे ही देंगे अच्छे लोग हैं।"

वैभव, " उन्होंने तो कहा था कि हमारे पास काम आते ही हम आपके पैसे आपको वापस लौटा देंगे पर मैंने मना कर दिया क्योंकि इसी वक्त के लिए ही तो मैं उन्हें इकट्ठा भी कर रहा था कि कब किसी जरूरतमंद के काम आ सके और आज उनकी मदद करके मेरे दिल को एक अलग ही खुशी और सुकून का एहसास हो रहा है। तुम ही सोचो यदि हम उनकी जगह होते जब हमारे पास कोई काम नहीं होता, बच्चों के पास खाने के लिए राशन नहीं होता तो हम पर क्या बीत रही होती। आज भगवान की दया से हमारे पास इतना है कि हम अपना जीवन इस मुसीबत के समय में भी आराम से व्यतीत कर सकते हैं ।पर उन लोगों का क्या जिनके पास अपना जीवन जीने के लिए पूरे साधन भी नहीं है । खाने के लिए राशन नहीं है जरा उनके बारे में भी तो सोचो । आज यदि हम उनकी मदद कर सकते हैं तो क्या हमें उनकी मदद नहीं करनी चाहिए। क्या तुम खुश नहीं हो? देखो अब तो तुम्हारे सवाल का जवाब भी मिल गया ना तुम्हें। कि गुल्लक में जमा हो रहे पैसे किसके लिए है? मैंने कहा था ना गुल्लक में जमा हो रहे पैसे हमारे परिवार के सदस्य के लिए ही है । यह भारत हमारा देश हमारा परिवार ही तो है और इस देश में रहने वाले सभी नागरिक हमारे परिवार के ही तो सदस्य हैं ना। "

रमा पहले तो अपनी भौंहें सिकोड़ कर वैभव की ओर एकटक देखती रहती है और फिर मुस्कुरा देती है।


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