Deepika Kumari

Inspirational


4.1  

Deepika Kumari

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बंधन सुकून का

बंधन सुकून का

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 "एक लड़का तो होना ही चाहिए"

 सदियों से चली आ रही लोगों की यह सोच 21वीं सदी में अब कुछ बदल रही हैं। यह देख कर दिल को बड़ा सुकून मिलता है कि इस सदी की नई पीढ़ी के अधिकतर लोग लड़का और लड़की को एक ही नजर से देखने लगे हैं। यहां तक की मैंने कुछ परिवार ऐसे भी देखें जिनकी एकमात्र संतान भी लड़की है और वे उसी के साथ खुश भी है। और कुछ परिवार ऐसे भी देखें जिनके घर एक लड़का होने के बाद वे दूसरा बच्चा लड़की चाहते हैं । पहले लड़के के लिए लड़कियों को कोख में मार देने वाले निर्दयी पीढ़ी के बच्चे बड़े होकर अब लड़की होने की दुआ भी करने लगेंगे इस बात का अंदाजा शायद ही पुरानी पीढ़ी के लोगों ने कभी लगाया होगा।

लड़के और लड़की के बीच के भेदभाव को मिटाने वाला ही एक त्यौहार है रक्षाबंधन। जिसमें जरूरत होती है एक लड़का और एक लड़की की, एक पुरुष और एक महिला की। यह एक ऐसा त्यौहार है जो महिलाओं को पुरुषों के समान समानता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रक्षाबंधन जैसा त्यौहार उसी परिवार में सफल हो पाता है जिसमें लड़का और लड़की दोनों हो। बड़े ही भाग्यशाली होते हैं वे परिवार जिन पर ईश्वर की असीम कृपा से लड़का और लड़की दोनों ही जन्म लेते हैं। पर सब परिवार इतने भाग्यशाली नहीं होते। इस त्योहार पर उदास होती हैं वे बहनें जिनके घर भाई नहीं होता और उदास होते हैं वे भाई जिनकी बहन नहीं होती । पर मुझे लगता है इन सब में कहीं ना कहीं ईश्वर का भी दोष है । इंसानों में तो भेदभाव वह भी करता है। किसी के घर लड़के ही लड़के भेज देता है तो किसी के घर लड़कियाँ ही लड़कियाँ। क्यों ना उसने यह नियम बनाया होता कि सब का पहला बच्चा लड़की और दूसरा बच्चा लड़का ही होता। फिर ना तो कोई लड़के के लिए लड़कियों को कोख में मारता और ना ही कोई लड़की होने की मन्नतें मांगता। सब सुखी होते, फिर हर भाई के पास एक बहन और हर बहन के पास एक भाई होता। पर ऐसा है नहीं।

प्रतिज्ञा और अवंतिका दो ऐसी बहने थी जिनके पास राखी बांधने के लिए कोई भाई नहीं था। चाचा ताऊ के बच्चे भी दूर गांव में रहते थे। एक दिन के लिए इतनी दूर आना जाना संभव न था। वे हर साल रक्षाबंधन को अपने पिता से यही सवाल पूछती कि, 

"पापा, हमारे भाई क्यों नहीं है। आज के दिन मेरी सारी सहेलियाँ अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। पर हमारे पास कोई भाई ही नहीं है। आप भी एक भाई बाजार से ले आओ ना।" उनकी ऐसी मासूमियत भरी बातें सुनकर उनके पिता (विकास) हर बार कुछ ना कुछ बहाना करके बात को टाल जाते और वे दोनों सामने वाली आंटी के बेटे को ही राखी बांध कर खुश हो लेती थी। पर उस आंटी को यह पसंद नहीं था कि वे दोनों बहने उसके बेटे को राखी बांधे। क्योंकि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं पहले वे जो दूसरों को खुश देख कर खुश होते हैं जिनकी संख्या आज के जमाने में बहुत ही कम बची है और दूसरे वे जो दूसरों की खुशी देखकर खुद दुखी हो जाते हैं। यह सामने वाली आंटी भी दूसरे प्रकार के लोगों में से ही थी।

इस साल फिर राखी का त्यौहार आया और फिर से दोनों बेटियों की भाई खरीद लाने की ज़िद ने पिता को असमंजस में डाल रखा था। न जाने क्या सोचकर विकास ने कहा, 

"चलो, तुम दोनों अपनी राखी की थालियां तैयार कर लो। इस बार हम राखी ज़रूर मनाएंगे।"

 बच्चियों ने कहा ,"पर पापा हम सामने वाले अनिरुद्ध भैया को राखी नहीं बांधेगी। वह हमें मुंह चिढ़ाता है और राखी बांधने के बदले कुछ देता भी नहीं। "

पापा, "नहीं बेटा, आज हम राखी मनाने कहीं और चलेंगे।" 

प्रतिज्ञा, " पर कहां?"

 पापा, "तुम तैयार तो हो जाओ।"

दोनों बहने नए कपड़े पहन कर अपनी-अपनी थालियां लेकर आ जाती हैं । 

"इन थालियों को कार में इस तरह से रखो कि इनमें रखा पूजा का सामान और राखी खराब ना हो।" विकास।

अवंतिका, " पर हम कहां जा रहे हैं पापा?"

 विकास, " तुम्हारे भाइयों के पास। तुम चलो तो सही सब पता चल जाएगा। " यह कहकर विकास अपनी पत्नी को भी आने को कहता है। पर वह यह कह कर मना कर देती है कि तुम जाओ तब तक मैं घर का काम निपटा लेती हूं।

 विकास अपनी बेटियों को कार में बिठाकर ले चलता है। अवंतिका की उम्र 10 साल होती है और प्रतिज्ञा 7 साल की। घर से 45 मिनट की दूरी पर एक चौराहा आता है। जहां दो सात-आठ साल की उम्र के लड़के गुब्बारे और राखी बेच रहे होते हैं। विकास अपनी कार साइड में लगा कर दोनों बच्चियों को उतरने के लिए कहता है और कहता है, 

" बेटा देखो इनके हाथ! लगता है इन्हें अभी तक किसी ने भी राखी नहीं बांधी है। चलो इन्हें अपना भाई समझो और राखी बांध लो।"

 दोनों पहले तो अपने पिता की ओर देखती है फिर उन लड़कों की ओर देखने लगती हैं और कहती हैं , "क्या ये हमसे राखी बंधवाएंगे?" 

 विकास, " क्यों नहीं तुम जाओ और कहो, भैया क्या मैं आपको राखी बांध दूँ।"

अवंतिका कहती है, " पर पापा ये तो कितने गंदे से हैं, इन्हें राखी बांधने का मन भी नहीं कर रहा।"

विकास, " नहीं बेटा ये गंदे नहीं है बस दिन भर धूप में बैठने के कारण इनका रंग काला हो गया है पर इनका मन तुम्हारे अनिरुद्ध भैया से बहुत अच्छा है। ये तुम्हारी राखी से चिढेंगे नहीं, बल्कि बहुत खुश होंगे।" 

प्रतिज्ञा पहले जाती है और उन लड़कों में से एक से कहती है, " भैया, हमारे पास भाई नहीं है। आज राखी है, क्या तुम हमारे भैया बनोगे?"

लड़का प्रतिज्ञा की बात सुनकर कुछ सकपका जाता है और प्रतिज्ञा को चुपचाप देखता ही रहता है। फिर विकास उस लड़के से कहता है, " बंधवा लो बेटा।" 

लड़का उदास होकर नीचे गर्दन करके कहता है, "अंकल, मैं राखी तो बंधवा लूंगा पर मेरे पास बहन को देने के लिए कुछ भी नहीं है।"

विकास उसकी मासूमियत पर हँस पड़ता है और कहता है कि , "गुब्बारे हैं तो सही देने के लिए, इनमें से ही एक दे देना। तुम्हें इसके पैसे मैं दे दूँगा, तुम चिंता ना करो।"

विकास की बात सुनकर लड़का मुस्कुरा देता है और प्रतिज्ञा उसे राखी बांधती है और अवंतिका दूसरे लड़के को बदले में वे दोनों को गुब्बारे देते हैं और मुस्कुराते हुए दूर बैठी अपनी मां के पास दौड़ जाते हैं और बड़ी उत्सुकता से उसे अपनी राखी दिखाते हैं। उनकी मां विकास की ओर हाथ जोड़कर नमस्कार करती है और बदले में विकास भी हाथ जोड़कर उसकी नमस्कार का मान रखता है। दोनों बहने खुशी-खुशी अपने घर आ जाती हैं और भाइयों से मिला तोहफ़ा अपनी मां को दिखाती है।

विकास के दिल को जो सुकून आज मिला वह उसे आज से पहले कभी महसूस नहीं हुआ। यह सुकून उसे मिला उन ग़रीब बच्चों के चेहरों पर आई मुस्कान से, अपने बच्चों को खुश देखकर उनकी मां के चेहरे पर मुस्कान से, अपनी बच्चियों को अपने भाईयों से मिले तोहफे को पाकर आई मुस्कान से। ‌उसे नहीं पता था कि किसी के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान लाने का अनुभव इतना सुखद भरा भी हो सकता है।


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