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Ira Johri

Abstract


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Ira Johri

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अटूट बंधन

अटूट बंधन

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पहले मधुर सावन फिर बसन्त के बाद आये फाल्गुन के रंगों भरे रंगीन बादलों को देख आज तुम बहुत याद आये लगा जैसे कि बादलों से हाथ बढ़ा तुम कहना चाह रहे हो कि मैं इस लोक में रहूँ या परलोक में ।हर सुख दुःख में तुम्हारी यादों में हमसाया बन सदा साथ रहूँगा।तुम जब भी बच्चों को देखेगी उनमें हमारी ही छवि पाओगी।तभी बेटे द्वारा कंधा हिला कर यह कहने से मैं जैसे सोते से जाग पड़ी कि "हर समय कहाँ खोई रहती हो माँ !तुम्हे भूख नहीं लगती ।मुझे तो बहुत जोर की भूख लग रही है । आज खाना नहीं बनाओगी ।कुछ खाने को दो न ।"

मैं हड़बड़ा कर उठी और कैलेन्डर की तारीख देखी पूरे छः माह हो गये उनको गये ।लेकिन हर लम्हा अब भी उनकी कमी बहुत खलती है ।और उनकी याद में बह रहे आँसुओं को चुपके से पोंछ मुस्कान ओढ़ बेटे के सिर पर हाथ फेर भोजन तैयार करने के लिये चल दी। 


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