असली मर्द
असली मर्द
रेवा स्कूटी से बाजार से घर लौट रही थी सर्दियों की शाम दिन जल्दी डूब जाता है। गलियां सुनसान थीं पर एक जगह भीड़ को देखकर वह ठिठक गयी। देखा तो पता चला 2 गुन्डे टाइप के लड़के 15-16 साल की लड़की का पीछा करते यहां आ पहुंचे थे साथ ही छेड़छाड़ कर रहे थे , पर किसी में उनको इस कुकृत्य को रोकने की हिम्मत नहीं थी सभी तमाशाई बने मूक देख रहे थे।
तभी कहीं से लगभग 50 वर्षीय व्यक्ति ने उनको हाथ से परे कर लड़की को अपना कोट दे पहनने को कह जाने को बोला और स्वयं पूरी ताकत से गुंडों से भिड़ गया।
लोगों के बीच तरह-तरह की फुसफुसाहटें आ रहीं थीं अरे!! ये तो ठुमके लगाने वाला हिजड़ा, किन्नर, नचैय्या है। पर किसी के अंदर लड़की को बचाने का जज्बा दिख ही नहीं रहा था, तो कोई वीडियो बनाने में मशगूल था मानों कोई नाटक का भाग चल रहा है।सब कितने संवेदनहीन।
गुंडे अपने मन्तव्य मे व्यवधान पड़ने से बौखलाए दाहिने पैर में पिस्टल से गोली मार निकल गये। पैर से लगातार खून बहने से वह व्यक्ति शिथिल सा हो रहा था।
तभी रेवा की नजर सामने गिरते उस व्यक्ति पर पड़ी उसने तेजी से उसे सहारा देकर एक निकलते ऑटो को रोका पर ठंड का वास्ता दे उसने अस्पताल लेकर जाने से मना कर दिया। तभी रेवा बोली बस मेरे एक प्रश्न का उत्तर देते जाना। पास में खड़ी थर-थर कांपती लड़की को दिखाते हुए बोली " मान लो इस लड़की की जगह तुम्हारी बहन बेटी होती उसकी आबरू बचाते ये व्यक्ति घायल होता तब भी तुम्हारी मानवता न कराहती। वह भी तो किसी की बहन बेटी होगी, हादसा कहकर थोड़ी आते हैं या सब जगह हम बहन बेटी के पीछे साये की तरह चल सकते हैं।
तभी उसे रेवा के शब्द अंदर तक वैध गये उसने सहारा दे उसे बैठाया।तभी फुसफुसाहटों के प्रतिउत्तर में बोली,
"क्या किन्नर इंसान नहीं उनके भावनायें नहीं ? क्या वे माँ-बाप से नहीं जन्मते? उनके भाई-बहन नहीं होते। उन्हें ईश्वर ने कुछ शारीरिक अक्षम बनाया आप सब तो मानसिक*****
कह बात अधूरी छोड़ लड़की को स्कूटी में बिठा ऑटो के साथ निकल मन ही मन सोच रही थी उस भीड़ में मानवता को सहेजता असली मर्द तो वही था।
