अमावस्या की रात
अमावस्या की रात
शहर से दूर, एक आलीशान होटल, नाम ऐसा कि लोग दूर दराज से आकर यहाँ ठहरते। बेहतरीन जगह, जिसके पूर्व में मुख्य मार्ग तो पश्चिम की तरफ एक गहरी खाई, उसके नीचे घना जंगल, लम्बे लम्बे पेड़, कटीली झाड़ियाँ। ठीक इसी के ऊपर यह होटल। होटल मालिक इस जगह पर होटल बनाकर आज अरबों खरबों में कमाई कर रहा हैं। बहुत से लोग खाई के साथ साथ जंगल की खूबसूरती देखने के लिए आते हैं। उत्तर दिशा में होटल, तो दक्षिण में कार बाइक पार्किंग की जगह बनाई गई है। यहाँ लोग बाहर खुले में बैठकर खाने का मजा ले सकते हैं। खाने खाते हुए जंगल के नजरों का आनंद लेना खास है। इसी शहर के अमीर ही नहीं दूर दराज के लोग भी घूमने के बहाने यहाँ आते हैं। शाम को जंगल में ढलता सूर्य भी लोगों के मन को मोह लेता है। शाम से रात्रि बारह बजे तक लोगों का खाने पीने के बहाने आना जाना लगा रहता है।
घड़ी में शाम के पाँच बजे, होटल में भीड़ बढ़ने लगी। लोग अपने अपने सहपाठियों के साथ आने लगे। उन्हीं लोगों के बीच पच्चीस से अट्ठाईस उम्र के नौजवान का समूह इधर उधर घूमकर आनंद लेते दिखाई दिया। तीन लड़के दो लड़कियां, शायद दूर शहर से आये हुए हैं। कमरा इसी होटल में बुक हैं। लोगों की तरह शाम के नजारे को कैमरे में कैद कर रहे हैं।
उस वक्त उन्हें इंतजार था सूर्य ढलने का। ताकि उस नजरें को कैमरे में कैद कर सके। पांचों के नाम नागेश्वर, रवि, कार्तिक, कोमल और शीतल हैं। लड़के में नागेश्वर और कार्तिक देखने में हट्टे कट्टे जवान, चौड़ा सीना, भरा बदन, चेहरे पर दाढ़ी। वही कोमल और शीतल भी शहरी लड़की, गोरी चिट्ठी रंग, बदन भरा हुआ और शरीर में कपड़ा नाममात्र का। बड़े बाप की औलाद, नये फैशन का जमाना, चल जो इन्हीं से रहा हैं। कोमल नागेश्वर की गर्लफ्रेंड, शीतल कार्तिक की, अकेला था तो रवि। वह दोनों से शांत स्वभाव का पतला दुबला लड़का, उनके पीछे पीछे घूम रहा हैं।
जंगल की ओर देखने के बाद नागेश्वर के मन में एक बात सूझी, क्यों न जंगल के अंदर जाकर देखा जाये। उसने सभी से कहा-
"समुन्दर में तैरने का मजा तो समुन्दर के अंदर जाकर ही लिया जा सकता है क्यों न हमें भी ऐसा करना चाहिए दोस्तों।"
कार्तिक समझा नहीं, उसने पूछा-
"मतलब, कहना क्या है?"
"ये जंगल, देख रहे हो कितना सुन्दर लग रहा है यार। क्यों न हमें इसके बीच जाकर देखना चाहिए। मुझे वहाँ की फोटो लेनी हैं।"
नागेश्वर ने अपने मन की बात बोला।
कार्तिक ने कहा -
"तू क्या पागल हो गया? इतनी गहरी खाई, और कितना खतरनाक जंगल। एक भी खूंखार जानवर मिला तो हमें वही खा जाएगा।"
नागेश्वर ने जंगल की ओर इशारा करके बताया-
"वो सुन, इस जंगल में कोई जानवर वानवर नहीं है। देख वो नदी दिख रही, वहाँ तक जाकर वापस आ जाएंगे। और तू तो ऐसे डर रहा है डरपोक, यहाँ चरवाहे रोज अपने मवेशी चराकर जाते हैं। जल्द वापस आ जाएंगे भाई। फिर अपने साथ लड़की भी तो हैं जिन्हें घुमाने लाए हैं।"
सभी उसकी तरफ देखने लगे।
रवि ने कहा-
"नहीं नहीं भाई, ये खाई ही खतरनाक। यहाँ से जाना मतलब मौत के मुँह में जाना। फिर उस नदी की दूरी भी नहीं पता, जाने कितना समय लग जाए वहाँ तक पहुँचने में, वापस आने में कही रात हो गई क्या होगा।"
सभी लोग रवि की तरफ देखने लगे। नागेश्वर अपने हाथ की घड़ी में समय देखा और कहा-
"पाँच बज रहे हैं, अभी शाम होने में दो घंटे हैं। अगर हम इस रास्ते से वापस नहीं आ सकते तो वहाँ कोई न कोई रास्ता तो मिल जाएगा। हम यूँ जाएंगे और यूँ वापस आ जाएंगे।"
रवि ने उन्हें रोकना चाहा-
"नहीं नहीं मैं नहीं जा सकता खतरा मोल लेने।"
उसने साफ मना कर दिया तो नागेश्वर ने उसके यह कहकर मजे लिया -
"भाई तुझे किसने कहा तू चल, वैसे भी तू अकेला वहाँ जाकर करेगा क्या। हम दोनों की तो गर्लफ्रेंड साथ है। इसलिए तू आराम से होटल के कमरे में रूक।"
नागेश्वर के सुझाव से दोनों लड़की तैयार थी। जिससे बात बन गई। आखिरी में रवि को चलना पड़ा। सभी रास्ता ढूँढने लगे, मगर खाई में जाने के लिए कोई रास्ता नहीं दिखा। एक जगह पानी निकलने का रास्ता जरूर था, जहाँ से पहाड़ी का पानी उस खाई में गिरता है। जगह इतनी थी कि वहाँ से कोई भी व्यक्ति आसानी से निकल सकता है। उन्हें कोई देखता कि उससे पहले पांचों उसी रास्ते से खाई की तरफ निकल गये।
सम्भल सम्भल के पहाड़ी से उतरे, कही पेड़ो का सहारा तो कही फिसल भी गये, किन्तु उनकी जिद आगे किसी की नहीं चली। सही सलामत लगभग दो घंटे पैदल चलने के बाद नदी के किनारे पहुँचे। दूर दूर तक किसी इंसान का कोई पता नहीं। बस कान में पक्षियों के कलकलाने की आवाज़ जरूर सुनाई दे रही थी। सूर्य भी ढल चुका था, अन्धेरा होने ही वाला था। पाँचों बुरी तरह थक चुके थे। नदी के ठण्ड रेत के ऊपर लेट कर लम्बी लम्बी सांस ले रहे थे। उन्हें शीघ्र ही लौटना था किन्तु जिन कठानईयों को सहन करके वो खाई वाले रास्ते से यहाँ पहुँचें, उस रास्ते से जाने उचित नहीं समझे। तब उन्होंने एक नये रास्ते से वापस जाने की सोची।
सभी ने साथ में लाये कुछ चीजों को खाकर पानी पीकर चल दिये। किन्तु जंगल के पेड़ इतने घने और ऊँचे थे कि दूर दूर तक कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। फिर भी वो चले जा रहे थे। आज अमावस्या की रात थी तो अन्धेरा भी गहरा था। मोबाइल की फ्लैश से काम चल रहे थे। जब होटल से निकले तब सोचे नहीं थे कि इतनी मुसीबत में फंस सकते हैं। मोबाइल पर नेटवर्क न होने के कारण किसी से कोई सम्पर्क भी नहीं हो सकता था। खैर किसी तरह हिम्मत करके आगे बढ़ रहे थे।
लगभग दस बजे उन्हें जंगल से बाहर जाने का रास्ता नहीं दिखा। थोड़ा आगे बढ़े तो एक पुराना खण्डहर महल दिखा। उनके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। कुछ उम्मीद जगी। बाहर से उस महल के चारों तरफ बाड़ा लगा था। रोशनी का कोई अता पता नहीं। किन्तु उन्हें लगा सभी लोग सो गए होंगे, इसलिए जाकर मदद माँगनी चाहिए।
महल पुराना था, मगर चारदिवार की दरवाजा मजबूत लोहे से बना हुआ हैं। सभी ने दरवाजे के ऊपर चढ़कर बाड़े के अंदर पहुँचे। सभी बुरी तरह डर भी रहे थे। जरा सा भी पत्ते खड़खड़ाने की आवाज़ आ जाए तो उनकी सांसे रूक जाती। साथ में लड़की तो थी। यदि उन्हें कुछ हो गया तो वो क्या जवाब देंगे। धीरे धीरे करके एक दूसरे का हाथ थाम उस घर के दरवाजे पर पहुँचे। दरवाज़ा उन्हें खुला मिला। चारों तरफ सिर्फ अंधेरा। उन्हें लग रहा था कोई उन्हें घेर रहा है। पीछा कर रहा है। चोरी चुपके उन पर नजर हैं उसकी। किन्तु सामने नहीं आया इसलिए उनकी हिम्मत कम नहीं हुई। उन्हें तो किसी तरह रात गुजरनी थी। इसलिए महल के अंदर गए।
"कोई हैं... " कहकर जैसे नागेश्वर ने चिल्लाया, तो घर में एक कम्पन सी हुई। घर उसकी ही आवाज़ से गुंज उठा। दीवारें चरमराने लगी। पेड़ हिलने लगे। सब के सब एक दूसरे से चिपक गए।
बिना बादल के बिजली कड़की और किसी तेज तूफान का अनुभव से सभी की आँखें मुंद गई।
"कार्तिक, भाई कुछ गड़बड़ है यहाँ, कोई इंसान के रहने जैसा कुछ लगता नहीं।"
रवि ने डरते हुए अपने मित्र से कहा।
पुन: बिजली चमकने से छत पर किसी की परछाई दिखाई दी। एक बार नजर आई, फिर गायब हो गई। सभी बुरी तरह डर गए। उन्हें अंदाजा नहीं था कि वो कहाँ आकर फंस चुके। नागेश्वर ने हिम्मत करके कहा-
"ये सच हैं कि यह इंसान के रहने लायक जगह नहीं । किन्तु डरने की कोई बात नहीं। हमारे पास दूसरा विकल्प नहीं इसलिए रात यही ठहरते हैं। बैग में जो रखा हैं उसे खाते पीते है।"
"लेकिन वह काली परछाई क्या थी छत पर? देखा किसी ने, अब गायब क्यों हो गई?"
शीतल ने कहा। वह बुरी तरह डरी हुई, जीने की उम्मीद छोड़ चुकी।
नागेश्वर ने कहा-
"वह कुछ भी नहीं, हम जैसा सोचेंगे फिर वैसा ही मिलेगा। इससे बेहतर आराम से रुकते हैं। वैसे भी भूत प्रेत की कहानी सिर्फ मूवी में मिलेगी रियल में नहीं।"
"नहीं नहीं वहाँ कुछ था।"
कार्तिक ने जैसे कहा वैसे दरवाजे से चर्र चर्र की आवाज आई। दरवाजा जोर से बंद हुआ, तुरंत खुल गया। सभी दौड़कर उस तरफ गये। देखे तो दरवाजा हिल रहा था।
"अभी हवी चली न, उसी के वजह से यह दरवाजा बंद होकर खुला। मैं सच कह रहा हूँ डरने से कोई फायदा नहीं, मस्त कोई कमरा रूकने लायक देखकर सोते हैं सभी।"
नागेश्वर ने सभी से पुन: कहा।
रवि ने अपने बगल में देखा तो काला सा व्यक्ति, चेहरा जला हुआ नजर आया, किसी से कुछ कहता उससे पहले गायब हो गया। वह आव देखा न ताव, मुख्य दरवाजे की तरफ भागा।
सभी चौंक गए। कार्तिक उसे रोकना चाहा किन्तु नागेश्वर ने यह कहकर रोक लिया
"जाने दे साले को, डरपोक हैं वह। सच तो ये हैं वह साथ लाने लायक नहीं था।"
वो लोग वही रूक गये। रवि जैसे ही बाहर बाड़े के दरवाजे निकट पहुँचा देखा एक बूढ़ा सा व्यक्ति, अपने हिलते डुलते शरीर को मटकते हुए दरवाजे पर अंदर से ताला लगा रहा था।
रवि ने उसे रोका-
"अरे! भाई हम लोग गलती से यहाँ भटक गए। तू कम से कम मुझे बाहर निकल जाने दे। इस तरह ताला क्यों लगा रहा हैं।"
रवि की बात का असर उस व्यक्ति पर जरा भी नहीं हुआ। वह ताला डालकर उसी मुद्रा में खड़ा रहा। रवि उसे एक टक निहार रहा था, एक वह था जो न कुछ बोला, न पीछे मुड़कर देखा।
अचानक रवि ने अहसास किया कि वह जिस हाल में खड़ा था उसी हाल में उसके तरफ आ रहा हैं। पीठ पीछे तेजी से उसकी तरफ आकर जमीन पर गिर गया। फिसल फिसलकर आने लगा। रवि वापस अपने साथियों की तरफ भागना चाहा तब तक वह जला व्यक्ति उसका पैर पकड़ लिया।
रवि चिल्लाया, पर उसकी आवाज़ बाहर नहीं निकल रही थी।
वह व्यक्ति हंसते हुए अपनी भारी आवाज़ में कहा -
"आज के दिन जो व्यक्ति इस महल में आता है वह हमारा भोजन बनता है। वर्षों बाद ऐसा भोजन करने का मौका मिला, एक दम ताजा खून, वो भी पाँच पाँच शरीर से। एक एक करके सबको शिकार बनाऊंगा। आज के दिन जो यहाँ फंसा उसके निकलने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।"
उसकी दोहरी आवाज़ रवि को अंदर तक हिला दी। देखने के बाद कलेजा धक धक करने लगा। वह बेहोश होता उससे पहले व्यक्ति के हाथ उसके गले तक पहुँच गये। वह पुरी ताकत से गला दबा रहा था। रवि छटपटा रहा था। खुद को कब तक बचाता आखिर उसकी जान निकल गई। लाश का एक पैर पकड़ भूत घसीटते हुए एक ओर ले गया।
कार्तिक ने महसूस किया कि रवि के साथ कुछ हुआ वह दौड़कर रवि की तरफ गया , उसके पीछे तीनों आए किन्तु रवि का कुछ पता नहीं चला।
"चला गया साला, हम सबको छोड़कर। मुझे तो पहले ही पता था वह किसी का साथ नहीं निभा सकता। इसीलिए उसकी आज तक कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनी।"
नागेश्वर ने रवि पर झल्लाते हुए कहा।
तभी महल के एक कमरे पर रोशनी दिखाई दी। किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। सभी एक दूसरे का मुँह देखते रह गये। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आखिर अचानक से कौन रोने लगा।
नागेश्वर यह कहकर उस तरफ बढ़ा कि-
"पक्का ये रवि का काम होगा। वह हमें डराने की कोशिश कर रहा है। साले को अभी मजा चखाता हूँ।"
सभी उसके पीछे पीछे जाने लगे। दबे पैर से प्रकाश भरे कमरे को बाहर से देखा तो उनके होश उड़ गये। सभी के दिल धड़कने लगे। हाथ पैर कंपने लगे। बीच कमरे में खून से सनी रवि की लाश पड़ी हुई हैं। उसके निकट एक औरत सफेद साड़ी पहने बैठी रो रही हैं। डरते डरते चारों कमरे के अंदर गये। एक भयानक आवाज़ सुनाई दी। लाश के पास बैठी चुड़ैल रोते हुए बोली
"कलेजा कितना स्वादिष्ट हैं रे तेरा। पति हो तो मेरे पति जैसा, आज पाँच पाँच कलेजा खिलायेगा। जल्द दूसरा लाए तो मेरा जी भरे। आज तो पूरे पांच कलेजा खाकर अपनी पंद्रह साल की भूख मिटाऊंगी। अमावस्या की रात हैं बहुत दिन बाद आज कोई इंसान इस रात को मिला।"
कोई कुछ पूछता उससे पहले वह अपना सिर्फ सिर घुमा कर उनकी तरफ देखी। जला चेहरा, देखकर सब डरकर यहाँ वहाँ भागने लगे। कोई इधर कोई उधर। सबके सबके यह भूल गए कि कम से कम इस वक्त साथ रहना चाहिए। शीतल रसोई के कोने में छिपी चुड़ैल को दिख गई। उसे वही दबोच दी। पहले तो नाखून गड़ा गड़ा कर उसे तड़फाई बाद में गले पर मुँह लगाकर खून पीने लगी।
शीतल बचाओ बचाओ कहकर चिल्लाती रही मगर किसी की हिम्मत नहीं हुई बचाने की।
बचे तीन नागेश्वर, उसकी गर्लफ्रेंड कोमल और कार्तिक जो भागे भले थे अलग अलग, किंतु बाहर आकर आपस में मिल चुके। सभी ने शीतल के साथ जो हुआ देख लिया। उन्हें पता चल गया यहाँ पर एक भूत और चुड़ैल हैं। जो उनको मार रही हैं। शीतल को मार वह चुड़ैल खून से साने मुँह को अपने जीभ से चटाते बाहर निकली। कार्तिक शीतल के पास जाकर रोने लगा। नागेश्वर और कोमल एक दूसरे से चिपककर खड़े रहे।
नागेश्वर ने कार्तिक को साहस दिलाने की कोशिश किया-
"कार्तिक, मुझे माफ कर देना यार। आज मेरी वजह से शीतल नहीं रही। हम जल्द ही यहाँ से बचने का तरीका ढूँढते हैं।"
"क्या ढूँढ़ेगा, हम आज बुरी तरह फंस चुके हैं। जिससे बचने का कोई तरीका नहीं, हैं तो बस एक ही तरीका। इस चुड़ैल का मारना। तेरा क्या, मेरा तो एक दोस्त और गर्लफ्रेंड मारी गई। इसके बाद कौन, तू या मैं या फिर कोमल। वह किसी ने किसी को मारने के फिराक में होगी। मैं उसे नहीं छोड़ने वाला।"
उसने रसोई में पड़ी एक चाकू उठाया। बाहर की तरफ दौड़ा। उसके पीछे वो दोनों, तभी एक बिल्ली की आवाज़ सुनाई दी। तीनों उस आवाज़ की तरफ भागे। पास में एक कुआँ था जिसके नीचे से आवाज़ आ रही थी। तीनों दौड़कर उसके पास गये। वह दूर से घूमता हुआ नजर आया। नागेश्वर ने कार्तिक को उसके निकट जाने से रोका किंतु वह नहीं माना। उसने झांककर देखा, तो वह चुड़ैल कुएं के अंदर बैठी हुई थी। उसके साथ भूत भी था। दोनों एक दूसरे से चिपके हुए थे। और बिल्ली की आवाज़ निकाल रहे थे।
कार्तिक ने कहा-
"कुएँ के अंदर छिपकर क्या बैठी है डायन? एक बार बाहर आकर देख। मैं दिखाता हूँ तेरी औकात।"
इतना कहकर वह भूल चूका था कि उसके हाथ में एक साधारण चाकू हैं। जिससे सिर्फ सब्जी काटी जा सकती हैं। देखते ही देखते वह चुड़ैल हवा में उड़ती आई और कार्तिक का सिर पकड़ कुएं के अंदर खींच ले गई। वह बचाओ बचाओ चिल्लाता रहा किंतु उसकी कौन मदद करता। उन्होंने तो अपनी आँख बंद कर ली। जब तक आँखे खोले तब कुआँ घूमना बंद हो चुका था दोनों पास जाकर अंदर झाँक कर देखे तो कार्तिक कुआँ के अंदर गिरा पड़ा हैं। उसका पूरा शरीर छिन्न भिन्न, खून ही खून दिखाई दिया।
यह देख कोमल चीख कर दूर हटी। नागेश्वर कुछ समझ पाता कि कोमल की आवाज सुनाई दी
"नागेश्वर मुझे पकड़ो प्लीज, कोई मेरे पैर को अपनी तरफ खींच रहा हैं। नागेश्वर.. नागेश्वर...।"
नागेश्वर ने देखा कोमल का पैर भूत धरती पर लेटकर पकड़ रखा हैं। वह दौड़ा उससे पहले कोमल को खींच कर एक पेड़ के ऊपर ले गया।
"वर्षों हो गये, ताजे और जवान खून चूसे। आज मजा आ गया।"
भूत अपने मोटे आवाज़ में कहा। नागेश्वर चाह कर भी कुछ नहीं कर सका। उसे याद आया हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। वह सुना था हनुमान चालीसा पढ़ने से भूत प्रेत पास नहीं आते।
ऊपर कोमल का पैर पकड़े भूत हंस रहा था। उसका जला चेहरा और बालों से भरा शरीर साफ दिखाई दे रहा हैं। कोमल गिड़गिड़ा रही हैं रो रही हैं। नागेश्वर हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा हैं। किन्तु उसका कोई असर नहीं हुआ। कोमल को भूत उस जगह से गायब करके कहीं और ले गया। नागेश्वर उसे ढूंढने लगा। कोमल पार्क में एक जगह मरी पेड़ से टिकी मिली। उसके चेहरे पर आँख नहीं थी। जीभ भी कटी हुई। पूरा चेहरा खून से लथपथ हैं। नागेश्वर हनुमान चालीसा पढ़ना छोड़ चुका। चुपचाप उसी जगह सिर में हाथ रख पछताते हुए सिर पीटने लगा।
अपनी जिद के कारण कितनी बड़ी गलती कर बैठा। उसे अपने बारी का इंतजार था। मगर बच गया क्योंकि घड़ी पर सुबह के चार बज गये। वह हार थक अपने घुटने पर सिर रख सो गया। सुबह उठा तो खुद को सैकड़ों लोगों से घिरा पाया। पुलिस, पत्रकार, उस महल के सिक्योरिटी सभी थे। नागेश्वर कल रात्रि की बीती सभी को बताया। जैसे तैसे पुलिस के समक्ष चारों लाशों को वहाँ से उठाया गया। सिक्योरिटी ने पत्रकारों को बयान दिया-
"अमावस्या के रात दस बजे के बाद वहाँ किसी को नहीं जाने दिया जाता है। यह एक पुराने राजा की हवेली हैं। मगर एक दिन गलती से चोर और उसकी पत्नी इस जगह पर पहुँच गये थे, राजा उनके साथ गलत करके मार दिया तब से यहाँ पर भूत और चुडैल बनकर रहते हैं। सिक्योरिटी खुद दस बजे के बाद यहाँ से चले जाते हैं। पांचों दस बजे के बाद महल के अंदर गये, जिसका अंजाम इतना बुरा हुआ।"

