Mukta Sahay

Abstract Drama


4.5  

Mukta Sahay

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अध्याय-4, माँ मेरे मामा क्यों नही !

अध्याय-4, माँ मेरे मामा क्यों नही !

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इतवार का दिन था और सुबह-सुबह ही हम दोनों को इस तरह विचार मग्न देख अमित थोड़ी उलझन में आ गया कि हमें क्या हो गया है। वैसे इतवार को हमदोनो लेट से उठा करते है और अलसाई अवस्था में चाय का कप पकड़ अख़बार पढ़ा करते हैं। हमसे पूछता है “क्या स्कूल से टीचर ने कुछ भेजा है क्या, या पास वाली आंटी ने मेरी शिकायत की है क्या”। अमित आगे कहता है मैंने बॉल ज़रूर ज़ोर से किक करी थी ताकि वह गोल में एक ही बार में चली जाए लेकिन वह गलती से उनकी बाल्कनी में गिरी थी और उनके चाय के प्याले से लगा गई थी।

मैंने तो उन से माफ़ी भी माँग ली थी। बच्चे की मासूमियत को देख हम दोनो से रहा नहीं गया और नक़ली ग़ुस्सा ओढ़ते हुए हमने कहा आंटी बहुत ही ग़ुस्सा है, आगे से ध्यान रखना की ऐसा ना हो। और ये बताओ ज़रा कि उन्हें कितनी चोट आई थी। अमित थोड़ा सकुचाता हुआ सा कहता है, पता नहीं उन्होंने बताया नहीं था। उसे ब्रश करने के लिए भेज कर हम दोनों उसकी बातों पर थोड़ा हँस लेते हैं और माहौल हल्का हो जाता है। शाम को भाभी से मिलने की सोचते हैं लेकिन आज तो भैया घर पर होंगे तो उनका निकलना मुश्किल हो सो कल उनसे मिलने का प्लान होता है।

सुबह के दस बजे थे और माँ का फोन आया। एक बार को तो मैं डर सी गई की कहीं भैया ने माँ से कुछ ग़लत तो नहीं कहा। मैंने फ़ोन उठाया। माँ ने बताया मामा जी का फोने आया था और उन्होंने सारी बातें बताई हैं। जब से ये बातें पता चली हैं वह मुझसे बात करना चाहती थी लेकिन मौक़ा ही नहीं मिल रहा था। अभी छत की सफ़ाई करवाने के बहाने से छत पर आई है और मुझे फ़ोन लगाया है।

माँ ने कहा वह पापा से बात करेंगीं की पूरानी बातें भूल कर अब सब साथ हो लें। उन्होंने ये भी शंका जताई कि सभी एक बार को माँ भी जाएँ किंतु बड़े भैया को मनवाना आसान नहीं होगा। मैंने सोंचा जब हर तरफ़ से प्रयास होंगे तो सफलता तो ज़रूर ही मिलेगी। रिश्ते तोड़ कर कोई भी खुश नहीं होता। कई बार झूठे दम्भ के लिए लोग अपना रुख़ नरम नहीं करते लेकिन कहीं कोने में चाह तो होती ही है रिश्तो के मिलने की । यही सोंच कर मैंने भी फिर से प्रयास शुरू किया है। माँ से मैंने बड़ी भाभी के कल के कामों के बारे में पूछा तो पता चला कल उन्हें अंशु, मेरी भतीजी के स्कूल जाना है, वहाँ कुछ कार्यक्रम है। बातों बातों में ये भी पता चला कि कल दोनो भैया किसी काम से शहर से बाहर जा रहे हैं दो दिनों के लिए। मुझे तो लगा इस बार के प्रयास में हमें सफलता मिलेगी क्योंकि से शायद भगवान भी शायद ऐसा ही चाहते हैं तभी तो एक के बाद एक घटनाक्रम हमारे लिए अनुकूल होते जा रहे हैं। माँ से, भाभी के, अंशु के स्कूल जाने का समय पता कर मैंने फोन रख दिया।

भाभी से मिलने मैं अकेले ही गई, जब वह स्कूल से वापस आ रही थी । मैं और भाभी पास के ही मंदिर में बैठ कर बात करने चले गए। मुझे देख कर भाभी बहुत खुश हुई और मेरी भी आँखे छलक गई। हम दोनो बहुत सालों के बाद मिले कर इस तरह बात कर रहे थे। माँ, पापा, अंशु, दोनो भैया, छोटी भाभी सभी की बातें करी हम दोनो ने। अनुराग और अमित के बारे में भी भाभी ने बहुत कुछ पूछा। मैंने फ़ोन में उनकी फ़ोटो थी दिखाया। उन्होंने भी अंशु और सभी के फ़ोटो दिखाए। हमारी बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं थी। तभी छोटी भाभी का फोन आया, ये पता करने के लिए की उन्हें इतनी देर क़्यों हो रही है तो उन्होंने बताया की स्कूल में कार्यक्रम थोडा लम्बा हो रहा है इस वजह से थोडा और समय लगेगा।

फिर उन्होंने मुझे देखते हुए पूछा बता नैना किस कारण ऐसे मिलने आई है। सब ठीक तो है ना। मैंने कहा, भाभी सब ठीक तो है लेकिन इन दिनों एक सवाल हमारे लिए दर्द बना है। इस सवाल को हम कुछ समय के लिए टाल तो सकते हैं लेकिन निजात नहीं पा सकते। आज ये प्रश्न हमारे सामने है और थोड़े दिनों में ऐसे सवालों का सामना आपको भी करना पड़ सकता है।

अमित ये पूछता है कि उसके मामा क़्यों नहीं हैं। वह जनता है मेरे दो भाई हैं फिर भी उसके पास मामा क़्यों नहीं हैं। हमारे बीच की दूरी का कारण बता कर मैं उसके कोमल मन में किसी तरह की धारणा नहीं डालना चाहती। मैं और अनुराग चाहते हैं कि अगर हम पूरानी बातें भूल कर आगे बढ़े तो हमारी आगे की पीड़ी को भी रिश्ते मिल जाएँगे।

कल सुबह मैं और अनुराग, बड़े भैया से इस बारे में बात करने क्लब गए थे। हमने अपनी बात रखी तो उन्होंने मना कर दिया। भाभी अगर आप मदद करें तो हम अमित, अंशु को उन वंचित रिश्तों से मिलवा सकते है जो हम बड़ों के कारण उनसे दूर हैं ।

भाभी थोड़ी देर चुप रहीं फिर बोली देख नैना जैसे तूने शादी की, घर में लोगों की नाराज़गी है मैं नहीं जानती की सफलता मिलेगी या की नहीं लेकिन फिर भी मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं जानती हूँ की रिश्ते अनमोल होते हैं और मेरा मानना हैं उन्हें तोड़ना समस्या का समाधान नहीं है।

जैसी मनोस्थिति इस समय तुम्हारी है वैसी ही उस समय तुम्हारे पापा और भाइयों की थी जब तुम अपनी मर्ज़ी से, अकेले बिना किसी खून के रिश्ते के साथ के, शादी कर रही थी। तुम अकेली बहन थी अपने भाइयों की, उसपर भी सबसे छोटी थी । एक ही बेटी थी अपने पिता की। तुम्हारी शादी से जुड़े बहुत से अरमान पाल रखे थे इन सभी ने। मानती हूँ तुमने और अनुराग जी ने बहुत कोशिश की थी इन सभी को मानने की। यहाँ तक कि तुम्हारे ससुराल वाले भी आए थे बात करने पर हमारे तरफ़ से उनकी बात नहीं मानी गई थी। लेकिन क्या तुम्हारा वह प्रयास काफ़ी था? आज जिस शिद्दत से तुम अपने बेटे को खोए रिश्तों से मिलवाना चाहती हो क्या अपनी शादी के लिए अपने घरवालों को मनाने का प्रयास तुमने इसी शिद्दत से किया था। ज़रूर सोचना तुम इस बात को। भाभी की बात सुन कर मैं थोड़ी विचलित सी हुई, फिर स्वयं को सम्भाल मैंने।

भाभी आगे बोलती जा रही थी,

अब जब बात निकली है तो सुनो! तुम्हारे घर छोड़ के जाने से सभी बहुत रोए थे। तुम्हारे बड़े भैया को तो डॉक्टर के पास तक ले जाना पड़ा था क्योंकि उनकी तबियत बहुत खराब हो गई थी। पापा तो इनकी तबियत देख कर ऐसे घबराए थे कि बिलकुल पागलों की तरह हरकतें करने लगे थे। छोटे, जो कभी चुप नहीं होता था और हर भारी माहौल को हल्का करने में माहिर है, एकदम से चुप हो गया था, हँसना तो दूर वह मुस्काना भी भूल गया था। तुम नए जीवन की ख़ुशियों में शायद इस तरफ़ सोंच भी नहीं पाई होगी कि तुम्हारे पीछे घर में क्या क्या हुआ होगा। बस भगवान की कृपा थी की कुछ अनिष्ट नहीं हुआ था उस समय।

भाभी हाथ जोड़ ऊपर की तरफ़ देखती हैं। बोलते बोलते भाभी की आँखे बहती जा रहीं थी और पूरा चेहरा लाल सा हुआ जा रहा था। मुझे लगा आज सालों बाद उनके अंदर छिपा दर्द बाहर निकल रहा था। उन्होंने सभी के दर्द देखे थे, सभी को सम्भाल था लेकिन उनका दर्द किसी ने नहीं देखा। मुझे उस समय बहुत ग्लानि हो रही थी। मैंने अपने घर वालों को कितनी पीड़ा दी है।

मुझे इन सब के बारे में कुछ पता नहीं था, माँ ने भी आज तक नहीं बताया था ये सब। वैसे वह भी कैसे बताती चोरी से तो बात कर पाती थी, वह भी छोटी सी। मैं तो धीरे-धीरे खुश हो गई थी अपनी ज़िंदगी में, हाँ ख़ालीपन था लेकिन मेरे छोड़े हुए परिवार को तो मैंने घाव दिया था, कभी ना भरने वाला घाव।

दो पल को भाभी चुप हुई, फिर अपने रुँधे हुए गले को साफ़ करते हुए आगे कही, तु अब तो माँ बन गई है। माँ की ख़ुशी और पीड़ा समझती भी होगी। सोंच तूने उस माँ के साथ क्या किया था। अपनी दुल्हन बनी बेटी को देखने, उसे सजाना हर माँ की चाह होती है। सोंचो अपनी माँ के बारे में। जब तुम दुल्हन बनी तो ना तुम्हें पापा ने निहारा और ना ही माँ ने बलैयाँ लीं। तूने तो ,छः महीने या साल भर ही सही, इतने छोटे समय के रिश्ते के किए अपने जन्म देने वाले माता-पिता और बचपन के साथी भाइयों के बरसों के रिश्ते को बस झटके से तोड़ दिया था। अब एक एक शब्द मुझे तीर की तरह भेद रहा था, मुझे झकझोर रहा था।

भाभी एक रौ में बहती बोलीं जा रही थीं और मैं भी उन्हें चुप नहीं कराना चाहती थी। पहली बार किसी ने मन को चीरने वाली बातें मुझे सुनाई थी। मेरी गलती का अहसास मुझे कराया था। किसी ने हक़ से मुझे उलाहन दिया था। ग़ुस्सा भी तो अपनों से ही होते है ना इसलिए भाभी का ऐसी बातें कहना मुझे अच्छा लगा, लगा की अब भी मैं उनकी अपनी हूँ।


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