शिखा श्रीवास्तव

Abstract


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शिखा श्रीवास्तव

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आशा का सवेरा

आशा का सवेरा

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"काकी माँ, काकी माँ, कहाँ हो... जल्दी आओ ना।" निशिका की आवाज़ पूरे घर में गूँज रही थी।

आँचल में हाथ पोंछती हुई रसोई से निकलती अपनी काकी माँ अनुसूया जी को देखकर निशिका फिर बोली "ओफ्फ हो काकी माँ, आपसे कितनी बार कहा है यूँ अपनी पहनी हुई साड़ी में हाथ मत पोंछा करो। जब आप मेरे साथ शहर जायेंगी तब लोग क्या कहेंगे देखकर? बताओ भला।"

"यही कहेंगे कि मेमसाहब की काकी माँ बिल्कुल गंवार है।

अच्छा ये छोड़ और बता, क्यों पूरे घर को सर पर उठा रही है?" अनुसूया जी हँसते हुए बोली।

निशिका ने एक भारी-भरकम थैला उनके हाथ में देते हुए अतिरेक उत्साह से कहा "मेरी शादी का लहँगा आ गया काकी माँ। एकदम दीपिका पादुकोण जैसा।"

अनुसूया जी ने थैला खोलना चाहा पर उसकी गांठ खुल ही नहीं रही थी। कोशिश करते-करते वो पसीने-पसीने हो गयी और उनके हाथ से थैला छूट गया।

तभी उनके कान में आवाज़ आयी "काकी माँ, मेरा लहँगा खराब हो गया।"

"नहीं बिटिया, मैं इसे खराब नहीं होने दूँगी।" अनुसूया जी ने कहा।

उनकी आवाज़ मानों खाली दीवारों से टकराकर उन तक ही लौट आयी हो।

तभी उनकी आँख खुल गयी और उन्हें महसूस हुआ कि वो सपना देख रही थी।

स्वयं को संभालने की कोशिश करती हुई वो बिस्तर से उठ ही रही थी कि कानों में पड़ती हुई आवाज़ ने उन्हें याद दिला दिया कि ये मनहूस सपना दरअसल हक़ीक़त बन चुका था।

आज जिस घर में निशिका की शादी की शहनाई बजने वाली थी वहाँ मातम पसरा हुआ था।

निशिका की भाभी अनिता उसे कोसते हुए चिल्ला रही थी।

निशिका और नवल अनुसूया जी के जेठ-जेठानी के बच्चे थे। दोनों में पाँच वर्ष का अंतर था।

निशिका के जन्म के बाद उसकी माँ की तबियत जो बिगड़ी तो बिगड़ती ही चली गयी।

ऐसे में निशिका की परवरिश की जिम्मेदारी अनुसूया जी ने ले ली। देश की रक्षा करते हुए सीमा पर शहीद हो गये उनके पति के बाद निशिका उनके अँधेरे जीवन में उजाले की किरण बनकर आयी थी।

निशिका के माता-पिता को उससे कोई विशेष लगाव नहीं था। लेकिन अनुसूया जी का लाड़-प्यार उसे कभी दुखी नहीं होने देता था। हमेशा उसके चेहरे पर एक मनमोहक मुस्कान सजी रहती थी।

निशिका जब थोड़ी बड़ी हुई तब अनुसूया जी ने उसके पिता से उसके विद्यालय में दाखिले की बात की। लेकिन उन्होंने उसकी शिक्षा को फिजूलखर्ची का नाम देकर साफ इंकार कर दिया।

जब अनुसूया जी ने विद्यालय का खर्च उठाने की जिम्मेदारी ले ली तब उन्होंने अपनी सहमति दे दी।

अनुसूया जी को मिलने वाला विधवा-पेंशन और पहले से जमा की हुई थोड़ी-बहुत पूँजी से उनका और निशिका का खर्च आराम से चल जाता था।देखते ही देखते निशिका ने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। लेकिन अब आगे की पढ़ाई उसके और अनुसूया जी के लिए मुसीबत बन गयी थी क्योंकि गाँव के विद्यालय में आगे की पढ़ाई की सुविधा नहीं थी।


अनुसूया जी ने अड़ोस-पड़ोस से पता किया तो मालूम हुआ कि पास के कस्बे में बारहवीं कक्षा का विद्यालय है, लेकिन वहाँ बस से ही आना-जाना संभव था जिसमें एक घंटे का वक्त लगता था।

जब अनुसूया जी ने रोज निशिका के साथ आना-जाना स्वीकार किया तब जाकर बड़ी मुश्किल से एक बार फिर उसके पिता ने उसके दाखिले की इजाज़त दी।

एक दिन निशिका अनुसूया जी की गोद में सर रखकर उदास होकर बोली "काकी माँ, आपको मेरे लिए कितनी तकलीफ उठानी पड़ती है। घर का सारा काम भी आपको करना पड़ता है और फिर मेरे साथ रोज आना-जाना भी। कभी-कभी जी चाहता है छोड़ दूँ ये पढ़ाई-लिखाई।"

"ना मेरी बिटिया रानी, फिर कभी ऐसी बात मत कहना। तुझे पढ़ना है और खूब पढ़ना है। तुझे इस गांव की आने वाली निशिकाओं के लिए आदर्श बनना है, उनके लिए आगे के रास्ते खोलने हैं। हमारा सफर अभी बहुत लंबा है लाडो। अभी से हार मत मान।" अनुसूया जी ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा।

"वाह-वाह क्या खूब सपने देखे जा रहे हैं। देखो-देखो और आज से ज्यादा देखो, क्योंकि अब इस घर को संभालने के लिए मेरी बहु आ रही है। अब तुम्हारी काकी माँ को ख्याली-पुलाव पकाने के लिए ज्यादा वक्त मिलेगा।" निशिका की माँ ने अपने कमरे से ही कहा।

ये सुनकर अनुसूया जी खुश होती हुई उनके पास पहुँची और बोली "सच जीजी, नवल का ब्याह पक्का हो गया? ये तो बड़ी खुशी की बात है।"

"हाँ खुशी की बात है पर सिर्फ हमारे लिए। मैं चाहती हूँ मेरी नज़रों के सामने मेरी बहु मेरी विरासत संभाल ले ताकि मैं चैन से इस दुनिया से जा सकूँ।

इसलिए मैंने और तुम्हारे जेठ जी ने ये फैसला किया है कि तुम दोनों माँ-बेटी अब अपनी गृहस्थी अलग कर लो। भला मेरी बहु सबकी चाकरी क्यों करती फ़िरेगी।"

"और आपके बीमार रहने के कारण काकी माँ जो आज तक अकेली सबकी जिम्मेदारी उठाती आयी उसका क्या? आज उनके बुढ़ापे में उन्हें इस तरह दुत्कार देंगे आप लोग?" निशिका आवेश में बोली।

"क्यों तू है ना उनकी लाडली उनका ख्याल रखने के लिए।" नवल ने व्यंग्य के स्वर में कहा।

निशिका कुछ और कहना चाहती थी लेकिन अनुसूया जी ने उसे इशारे से मना कर दिया और दोनों अपने कमरे में चली गयी।

घर में बँटवारे की लकीर खींच चुकी थी। अनुसूया जी को उम्मीद थी कि शायद नई बहू अनिता अपने व्यवहार से इस लकीर को मिटा देगी, लेकिन ये उनकी गलतफहमी ही साबित हुई।

अनिता भी गाहे-बगाहे अनुसूया जी और निशिका के लिए व्यंग्य-बाण छोड़ना अपना कर्त्तव्य समझती थी।

लेकिन अनुसूया जी और निशिका खामोश ही रहती थी।अब निशिका बारहवीं उत्तीर्ण कर चुकी थी। इससे पहले की अनुसूया जी उसकी आगे की शिक्षा के विषय में कुछ सोचती, निशिका के पिता ने समाज का हवाला देकर उसका ब्याह तय कर दिया।अनुसूया जी चाहकर भी विरोध नहीं कर सकी।

वो उदास सी अपने कमरे में बैठी हुई थी कि तभी चहकती हुई निशिका आयी और बोली "काकी माँ, शादी की सारी खरीददारी मैं आपके साथ करूँगी।"उसे खुश देखकर अनुसूया जी को हैरानी हुई।

उन्होंने जब उससे इस ख़ुशी की वजह पूछी तो निशिका बोली "काकी माँ, जब आपका होने वाला दामाद मुझे देखने आया था तो मैंने मौका पाकर उससे पूछा था कि क्या वो मुझे अपने साथ शहर ले जाकर आगे पढ़ने देगा? और आपको पता है उसका जवाब हाँ था। शहर जाने के बाद मैं आपको भी वहाँ बुला लूँगी। आप आयेंगी ना?"


निशिका का भोलापन देखकर अनुसूया जी मुस्कुरा उठी और ईश्वर से उसके सपने पूरे होने की मनौतियां मानने लगी।विवाह में बस एक सप्ताह रह गया था।सभी लोग तैयारियों में व्यस्त थे कि खबर आयी लड़के वालों ने दूसरी जगह ज्यादा दहेज मिलने की बात कहकर रिश्ता तोड़ दिया था। ये सुनते ही सारे घर में मातम छा गया था। सभी निशिका के दुर्भाग्य को ही इसके लिए जिम्मेदार मान रहे थे। अब रोज सुबह सबकी शुरुआत निशिका को कोसते हुए होती थी।


इस घटना ने कभी दुखी ना होने वाली निशिका को तोड़ दिया था।अकेली बैठी वो बस खाली दीवारों को ताकती रहती थी।अनुसूया जी उसे संभालने की नाकाम कोशिशों में लगी रहती थी।

दिन इसी तरह गुजर रहे थे की एक दिन निशिका के पिता मिठाई का डब्बा लेकर घर आये और सबको बताया कि उन्होंने दूसरी जगह निशिका का ब्याह तय कर दिया है और इस बार ना लड़की देखने-दिखाने का झंझट है ना ब्याह टूटने का डर। मंदिर में सादगी से ब्याह होगा।

अनुसूया जी ने जब लड़के और उसके परिवार के बारे में जानना चाहा तो उन्हें दो टूक जवाब मिला कि वो अपनी बेटी का भला-बुरा समझते हैं।ये सुनकर अनुसूया जी चुप रह गयी।

अगले दिन उन्हें पड़ोस से पता चला कि जिस लड़के से निशिका का ब्याह तय हुआ था वो दो बच्चों का पिता था और उम्र में भी निशिका से बहुत बड़ा था।ये सुनकर अनुसूया जी के पैरों तले जमीन खिसक गयी।

वो घर पहुँची और हिम्मत जुटाकर सबके बीच निशिका के पिता से बोली "भैया जी, आप निशिका के पिता हैं इसलिए उसके ब्याह के मुद्दे पर आपके फैसले का मैंने अभी तक विरोध नहीं किया था। लेकिन अब जब मैं सच्चाई जान चुकी हूँ तो अब किसी भी कीमत पर मैं मेरी निशिका का ब्याह दो बच्चों के बाप से नहीं होने दूँगी।"

उसकी बात सुनकर निशिका और सभी घरवाले सन्न रह गये।लेकिन निशिका के पिता ने कहा "चाहे कोई कुछ भी कर ले ये ब्याह तो होकर रहेगा।"

"आपने भले ही निशिका को जन्म दिया है लेकिन उसे पाला मैंने है। वो मेरी बेटी है। और अब तो वो बालिग हो चुकी है स्वयं अपने अभिभावक का भी फैसला कर सकती है और अपने ब्याह का भी। अगर उसके साथ आपने जबरदस्ती करने की कोशिश भी की तो मैं कानून की शरण लूँगी। इस बार अगर मैं चुप रहकर अपनी बेटी के साथ अन्याय होता देखती रही तो धिक्कार है मेरी ममता पर, मेरी परवरिश पर।" अनुसूया जी ने अपने आक्रोश को छुपाने की कोशिश किये बिना कहा।

झगड़े की आवाज़ सुनकर पड़ोस के भी कुछ लोग आ गये। उन सबको अनुसूया के साथ देखकर अंततः निशिका के पिता ने अपना फैसला बदल लिया। लेकिन उन्होंने ये भी ऐलान कर दिया कि चाहे भविष्य में अनुसूया जी उनके आगे कितना भी गिड़गिड़ाये अब वो निशिका के ब्याह की जिम्मेदारी नहीं लेंगे।

अनुसूया जी ने उनका ये फैसला मान लिया।अब निशिका के लिए कुछ भी करने के लिए उन्हें किसी की इजाजत की जरूरत नहीं थी।उन्होंने जब निशिका से भविष्य की योजना के बारे में पूछा तो निशिका बोली "काकी माँ, मेरी बारहवीं की कुछ सहेलियां बता रही थी कि शहर में एक ऐसा कॉलेज है जो घर पर पढ़ने के लिये किताबें वगैरह देता है, बस परीक्षा देने के लिए कॉलेज जाना पड़ता है। इसे दूरस्थ शिक्षा कहते हैं। मैं सोच रही थी मैं भी इसी माध्यम से स्नातक, फिर बी.एड और स्नातकोत्तर की पढ़ाई करूँ। मैं शिक्षक बनकर अपने जैसी लड़कियों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश भरना चाहती हूँ काकी माँ।"

"अच्छी बात है बिटिया। हम कल ही शहर चलेंगे।" अनुसूया जी ने निशिका को आश्वस्त करते हुए कहा।

जब घर में सभी लोगों को इस बात का पता चला तो सबने एक स्वर में कहा "देखते है दोनों माँ-बेटी मिलकर ये ख्याली पुलाव कब तक और कैसे पकाती हैं।"

अनुसूया जी ने निशिका का दाखिला स्नातक में करवा दिया।घर पहुँचकर अनुसूया जी बोली "पड़ोस वाली गीता कह रही थी कि आजकल सब कंप्यूटर से भी पढ़ते है। हम कल चलकर तेरे लिए कंप्यूटर भी खरीदेंगे। ताकि तू अच्छी तरह पढ़ सके।"

"लेकिन काकी माँ, वो बहुत महँगा आता है।" निशिका ने कहा।

अनुसूया जी अलमारी से अपने कुछ जेवर निकालते हुए बोली "जब तक तेरी काकी माँ ज़िंदा है तुझे पैसों के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है।"

जेवर देखकर निशिका उनके मन की बात समझ गयी। उसने विरोध करते हुए कहा "इन्हें आप अपने बुढ़ापे के लिए रखिये।"

"तू है ना मेरे बुढ़ापे के लिए।" अनुसूया जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

कंप्यूटर और किताबों की मदद से निशिका जोर-शोर से पढ़ाई में लग गयी। अब उसकी आँखों में बस एक ही सपना था, पढ़-लिखकर अपनी काकी माँ का नाम रोशन करना।

देखते-देखते छः वर्ष गुजर गए। निशिका ने स्नातक और फिर बी.एड भी पूरा कर लिया था, और अब लड़कियों के एक विद्यालय में पढ़ाते हुए शहर में ही कामकाजी लड़कियों के हॉस्टल में रहकर स्नातकोत्तर भी कर रही थी।

अनुसूया जी अक्सर उससे मिलने जाती रहती थी।

निशिका ने स्वयं अपने लिए और अनुसूया जी के लिए एक मोबाइल खरीद लिया था ताकि रोज बिना किसी व्यवधान के उनकी बातें होती रहे और उसकी काकी माँ बेवजह उसकी फिक्र में ना घुलती रहे।

एक दिन सुबह-सुबह निशिका ने अनुसूया जी को फोन किया और कहा "काकी माँ, जितनी जल्दी हो सके आप मेरे पास आ जाइये।"

अनुसूया जी किसी अनहोनी की आशंका से घबराती हुई तुरंत ही शहर के लिए मिलने वाली पहली बस में सवार हो गयी।

सारे रास्ते उनके दिमाग में अजीबोगरीब विचार आ रहे थे जिन्हें वो दूर झटकने का प्रयास कर रही थी। एक घंटे का सफर भी आज उन्हें बहुत लंबा लग रहा था।

जब वो घबरायी हुई निशिका के हॉस्टल पहुँची तो देखा आज निशिका ने कुछ अलग ही श्रृंगार कर रखा था।

अनुसूया जी ने थोड़े गुस्से में कहा "स्वयं यहाँ सज-धजकर बैठी है और इस तरह फोन करके मेरी धड़कन बढ़ा दी।"

"माफ कर दो काकी माँ। दरअसल मुझे आपसे किसी को मिलवाना है।" निशिका ने शरारत से कान पकड़ते हुए कहा।

अनुसूया जी आगे की बात समझ गयी और बोली "तू भी ना बिटिया एकदम पागल है। देख तो तेरी बात सुनकर मैं जैसे-तैसे ही चली आयी। अब इन कपड़ों में खास मेहमान से मिलने पर सब क्या कहेंगे?"

"यही कहेंगे कि मेरी काकी माँ मुझसे कितना प्यार करती है जो मेरे लिए दौड़ी चली आयी। अब चलिये मेरे साथ।" निशिका अनुसूया जी का हाथ पकड़कर बाहर आ गयी।

दोनों एक रेस्टोरेंट में पहुँचे जहाँ निशिका के साथ स्नातकोत्तर करने वाला कश्यप अपने माता-पिता के साथ उनका इंतजार कर रहा था।

निशिका ने सबसे अनुसूया जी का परिचय करवाया।

कश्यप के पिताजी ने बातचीत शुरू करते हुए कहा "हमें और हमारे बेटे को आपकी बेटी बहुत पसंद है। इसलिए हम आपसे रिश्ते की बात करना चाहते थे।"

अनुसूया जी ने स्वयं को संयत करते हुए कहा "ये तो बहुत खुशी की बात है भाईसाहब। देखिये ना इस पगली ने मुझे ऐसे अचानक फोन कर दिया कि मैं बस भागी चली आयी। मिठाई वगैरह भी कुछ नहीं ला पायी।"

"वो तो काकी माँ हमारे बीच शर्त लगी थी कि निशिका के फोन करने पर आप कितनी देर में यहाँ पहुचेंगी। आपको इस तरह दौड़-भाग करवाने के लिए मुझे माफ़ कर दीजिये।

फिर मैंने ही सोचा की अगर आप आ जायेंगी तो आपको अपने माँ-पापा से भी मिलवा ही दूँ।" कश्यप ने माफी माँगते हुए कहा।

"हाँ-हाँ बहुत जल्दी है तुझे अपने ब्याह के शहनाई की। समझते हैं हम।" कश्यप की माँ ने हँसते हुए कहा।

अनुसूया जी ने निशिका की तरफ एक नज़र देखा और कश्यप के माँ-पापा से कहा "अगर आप लोगों को दिक्कत ना हो तो घर आकर एक बार निशिका के माता-पिता से ब्याह के बारे में बात कर लीजिये।"

"जी आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। निशिका ने हमें सारी बातें बता दी हैं। इसलिए हम पहले आपकी सहमति लेना चाहते थे।" कश्यप के माता-पिता बोले।

"मेरी खुशी तो मेरी बेटी की खुशी में है। और मैं जानती हूँ वो किसी गलत इंसान को नहीं चुनेगी।" अनुसूया जी ने निशिका और कश्यप को आशीर्वाद देते हुए कहा।

अगली मुलाकात की बात तय करके सब लोग अपने-अपने घर के लिए निकल गए।

अगले सप्ताह जब कश्यप के माता-पिता निशिका के घर पहुँचे तब निशिका के पिता ने उनसे सपाट लहजे में कह दिया कि निशिका के जीवन से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वो और अनुसूया जी जो चाहे करें।

कश्यप के माता-पिता ने उनकी बात सुनने के बाद अनुसूया जी के साथ मिलकर ब्याह की सारी बातें तय कर ली।अगले महीने निशिका और कश्यप के ब्याह की तारीख पक्की हो गयी थीनिशिका और कश्यप के इच्छानुसार गाँव के मंदिर में ही शादी की व्यवस्था की गयी थी।

निशिका के माता-पिता, भाई-भाभी महज एक मेहमान की तरह ब्याह देखने पहुँचे।जब कन्यादान के वक्त पंडित जी ने निशिका के माता-पिता को बुलाया तब अनुसूया जी ने बड़ी उम्मीद से अपने जेठ-जेठानी की तरफ देखा लेकिन दोनों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

इससे पहले कि अनुसूया जी उनसे अनुनय-विनय करने उनके पास पहुँचती निशिका बोली "काकी माँ, आइये रस्म पूरी कीजिये।"ये सुनकर गाँव की एक महिला बोली "ये कैसे करेगी रस्म? ये तो विधवा है। विधवा से रस्म करवाना भारी अपशगुण होता है।"

"मेरे जीवन में काकी माँ के होने से बड़ा शगुन और कुछ नहीं हो सकता। जिन्होंने मेरी परवरिश की, मुझे काबिल बनाया, हर वक्त मेरे साथ खड़ी रही, मेरे ब्याह की रस्म करने का अधिकार भी सिर्फ उनका है।

जब पत्नी के ना रहने पर पुरुष को किसी शुभ काम से दूर नहीं किया जाता तो पति के ना रहने पर स्त्री के साथ होने वाले इस दोहरे व्यवहार को अब बदलना ही होगा।" निशिका ने दृढ़ स्वर में कहा।

उसकी बात से सहमति जताते हुए कश्यप की माँ अनुसूया जी का हाथ पकड़कर उन्हें मंडप पर ले आयी।भीगी आँखों और स्नेह में पगे ढ़ेरों आशीर्वादों के साथ अनुसूया जी ने कन्यादान की रस्म पूरी की और निशिका को विदा किया।

दो वर्षों के अथक परिश्रम के बाद निशिका का स्नातकोत्तर भी पूरा हो चुका था।डिग्री मिलते ही वो कश्यप को लेकर अनुसूया जी से मिलने पहुँची।अनुसूया जी ने दोनों के पसंदीदा पकवानों के साथ उनका स्वागत किया।खाने-पीने के बाद कश्यप ने अचानक अनुसूया जी से कहा "काकी माँ, अपनी आँखें बंद कीजिये। आपका बेटा आपके लिए एक उपहार लाया है।"

अनुसूया जी के आँखें बंद करने के बाद कश्यप ने उनके हाथ में कुछ कागज रख दिये।जब अनुसूया जी ने उन्हें पढ़ा तो सहसा उनकी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह चले।ये देखकर निशिका हैरान होती हुयी बोली "अरे ये क्या दिया है मेरी काकी माँ को जिसने उन्हें रुला दिया।"


अनुसूया जी ने अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कागज निशिका की तरफ बढ़ाते हुए कहा "लगता है दामाद जी तुमसे बहुत बातें छुपाते हैं। ये ठीक बात नहीं है दामाद जी।"

"माफी काकी माँ। आगे से ऐसा नहीं होगा।" कश्यप भी मुस्कुराते हुए बोला।

निशिका ने कागज देखे तो वो गाँव में लड़कियों के लिए बारहवीं तक का विद्यालय खोलने का सरकार का आज्ञा-पत्र था। विद्यालय के निर्देशक की जगह स्वयं उसका और कश्यप का नाम था।

इसके साथ ही विद्यालय के लिए जमीन के कागज के साथ-साथ विद्यालय के रजिस्ट्रेशन के भी कागज थे, जिन पर लिखा था 'अनुसूया उच्चतम विद्यालय'।

"ओह्ह तो इसलिए जनाब पिछले एक वर्ष से इतना व्यस्त रहते थे और मुझे भनक तक नहीं लगी।" निशिका अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए बोली।

कश्यप ने अनुसूया जी से कहा "काकी माँ, निशिका ने मुझे बताया कि आपने कितनी मुश्किलों का सामना करते हुए उसकी पढ़ाई करवायी। और ये भी की आपके मन में गाँव की लड़कियों के लिए कुछ करने की चाह है।इसलिए मैंने सोच लिया था कि अपनी काकी माँ का सपना मैं पूरा करूँगा। ताकि गाँव की अगली आने वाली निशिकाएँ इस बात का अफ़सोस ना कर सकें कि उनके पास कोई अनुसूया काकी माँ क्यों नहीं है।"

कश्यप की बात सुनकर अनुसूया जी की आँखों से पुनः ख़ुशी के आँसू बह चले।कुछ ही दिनों में सारी प्रक्रियाओं के तहत विद्यालय बनने का कार्य शुरू हो गया। गाँव के लोग भी अपनी बेटियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए इस काम में अपनी तरफ से हाथ बँटा रहे थे।


देखते ही देखते विद्यालय के आरंभ होने का दिन आ पहुँचा। कश्यप औऱ निशिका अनुसूया जी को साथ लेकर विद्यालय पहुँचे। जहाँ विद्यालय के सात शिक्षक, चालीस विद्यार्थी, अन्य कर्मचारियों के साथ-साथ लगभग सारे गांववाले उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।जब विद्यालय के मुख्य दरवाजे पर लगे हुए रिबन को काटने के लिए कश्यप ने अनुसूया जी के हाथ में कैंची दी तो वो बोली "नहीं बेटे, ये तुम्हारी मेहनत का फल है इसलिए ये शुभ काम तुम दोनों करो।"

सहसा गाँव के सरपंच जी बोले "लेकिन इस शुभ काम की प्रेरणा तो आप ही हैं अनुसूया बहन। आपने बिना किसी सहयोग के निशिका बिटिया को आगे बढ़ाया, जिसका सुखद परिणाम आज गाँव की दूसरी बेटियों को मिलने जा रहा है। इसलिए ये शुभ काम तो आप के ही हाथों होना चाहिए।"

गाँव के सभी लोग उनकी बात से सहमत थे। आज किसी के मुँह से अपशगुन की बात ना सुनकर निशिका बहुत प्रसन्न थी।सबके आग्रह पर अनुसूया जी ने मुख्य द्वार का रिबन काटा और सब लोग विद्यालय के अंदर पहुँचे।कश्यप की मेहनत वहाँ साफ़ झलक रही थी।सभी गाँववाले कश्यप, निशिका और अनुसूया जी के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे।

कश्यप की नेकदिल मेहनत के साथ-साथ अनुसूया जी और निशिका का संघर्ष आज 'अनुसूया उच्चतम विद्यालय' के रूप में सदा के लिए वक्त के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों से अंकित होकर जगमगाते हुए निशिका के माता-पिता, भाई-भाभी द्वारा उड़ाये गये उपहास, अपशब्दों और तिरस्कारपूर्ण व्यवहार का जवाब बनकर उनके सामने खड़ा था।


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