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Namita Sunder

Abstract


4.4  

Namita Sunder

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आश किरण

आश किरण

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“मम्मी देखो, यह शॉल कैसे उधड़ा जा रहा है। ऐसे तो यह बिल्कुल”कहते हुए सुगन्धा ने दोनों हाथों से कस कर भींच, शॉल को सीने से लगा लिय़ा।

महीनों से नींद भर न सोई आंखें, उलझे बेतरतीब बाल और एक अजब से उन्माद में डूबी दृष्टिमिसेज माथुर ने अपनी लाड़ली की हालत पर सीना फाड़ उमड़ती रुलाई को वहीं दफन किया और काम छोड़, हाथ साफ करती हुई सुगन्धा के पास आयीं।

“देखें तो भला क्या हुआ हमारी रानी के शॉल को।“ निचला होंठ दांतों में दबाते, कुछ बिसूरते हुए सुगंधा ने शॉल उनकी ओर बढ़ाया जरूर पर उस पर अपनी पकड़ ढीली नहीं की।

पिछले तीन महीने से वह इसी शॉल के संग उठती है, बैठती है, सोती है, जागती है।एक पल भी उसे अपने से अलग नहीं करती है। वह शॉल सुशांत लाया था उसके लिए जब वह हिमाचल गया था ट्रेनिंग पर। और कितना फबता था यह शॉल सुगंधा पर। शॉल में लिपटी सुगंधा को कैसी मुग्ध दृष्टि से निहारते हुए कहा था सुशांत ने उनसे, “जानती हैं, मम्मी जी, मैंने यह शॉल ऑर्डर पर खुद डिजाइन बता कर बनवाया था उस पहाड़िन से और कहा था एक एक गुलाब बनाते समय अपना वो प्रेम का पहाड़ी गीत गाती रहना, जिससे सुगंधा के लिए मेरे प्यार की खुशबू रच बस जाय इस शॉल में।“

कैसी निहाल हो गयीं थी वे इस पल अपने और बेटी के सौभाग्य पर। कहीं मेरी ही तो नजर नहीं लग गयी सोचते हुए सिहरन सी दौड़ गयी उनके शरीर में।

 एक्सीडेंट वाले दिन, पार्टी में जाते समय भी यही शॉल ओढ़े थी सुगंधा। वह क्लब जिसमें पार्टी थी, उनके घर के ही पास था, इसलिए वहां जाने से पहले बस दो मिनट को खड़े खड़े मिलने आ गये थे दोनों। क्या पता था उनको, दुर्भाग्य सब कुछ उलट-पलट करने से पहले आखिरी बार वो मोहिनी तस्वीर दिखाने लाया था, उन्हें उनके दरवाजे।

अचानक बादलों की गड़गड़ाहट से मिसेज माथुर की तंद्रा भंग हुई। चौंक कर उन्होंने बिटिया की ओर देखा जो आंखे गड़ाये उन्हें ही देख रही थी। उसे दुलराते हुए उसके चेहरे पर आ गये बालों को पीछे किया और बोलीं”अच्छा सुनो, सुगंधा तुम चाहती हो न कि यह शॉल हमेशा हमेशा तुम्हारे पास रहे?”

सुगंधा ने जैसे मां के कथन के पीछे क्या मंतव्य है जानने की कोशिश में अपनी दृष्टि कुछ और गहराई से उनके चेहरे पर टिका दी फिर धीरे से हां में सिर हिलाया।

“अपनी मां पर भरोसा है न!” इस बार वह खुल कर मुस्कुराई और मां से लिपट गयी

“तो ऐसा करते हैं कि इसे संभाल कर , ठीक कर के हम इसका एक गोल मेज पोश बना लेते हैं, सारे गुलाब एक एक कर उसमें टांक देंगे। फिर इसका उधड़ना भी रुक जायेगा और इसे तुम्हारे कमरे वाली छोटी गोल मेज पर डाल देंगे, जिस पर तुम्हारी और सुशांत की फोटो रखी है।“

सुगंधा के चेहरे पर असमंजस के भाव आ जा रहे थे। अपने हाथों में शॉल लिए वह उसे उलटने पुलटने लगी।

“सुशांत को भी यह गुलाब बहुत पसंद थे न, और उसे यह शॉल तुम्हारे ऊपर भी अच्छा लगता था न, तो जब उस मेज पर होगा तो वह भी बहुत खुश होगा, है न।“

बात समझने की कोशिश में सुगंधा की आंखें थोड़ा फैल गयीं।

“बेटा, कई बार चीजों को संभालने के लिए, सहेजने के लिए, थोड़ी फेर बदल जरूरी होती है। कुछ भी, कभी भी व्यर्थ नहीं होता, बस कैसे सहेजना है, यह हमें तय करना होता है। जा, न बेटा, सुई धागे वाला डिब्बा ले आ, हम दोनों मां बेटी मिल कर इसे फिर से संभालेंगे।“

कुछ देर बैठे रहने के बाद, पता नहीं क्या सोच कर, सुगंधा उठी शॉल मां की गोदी में रख, डिब्बा लाने कमरे की ओर बढ़ गयी। अपनी गोदी में पड़े शॉल को देख मिसेज माथुर का मन तरल हो उठा। धीरे से उन्होंने शॉल पर हाथ फिराया और ठीक उसी क्षण कमरे की अधखुली खिड़की से एक सूरज की किरण भीतर आ उनकी गोदी में सिमट गयी। उन्हें लगा, यह आश किरण सुशांत की ओर से ही आयी है। आज केवल शॉल के ही संवरने की शुरुआत नहीं है और उनकी उम्मीद भरी नजर डिब्बा ले लौटती सुगंधा पर टिक गयी।


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