Ms. Santosh Singh

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आजाद परिंदा

आजाद परिंदा

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उसकी आँखों में अजीब- सी उदासी थी। जब भी उसे देखती हूँ सोचती हूँ पूछ लूँ।पर हिम्मत नहीं होती। धीरे-धीरे हममें दोस्ती हो गई। इतवार को हमने चाय पर मिलने का प्लान बनाया। जब मैं उससे मिली तो पहले मैंने इधर -उधर की बातें की और अंत में पूछ ही लिया कि वह इतनी चिंतित क्यों रहती है।  

उसने बताया कि गत एक वर्ष से वह शर्मा एण्ड कंपनी में काम कर रही है।जब उसने कंपनी जाॅइन किया तो सहयोगियों ने खुले हाथों से उसका स्वागत किया। नामचीन कंपनी होने के कारण घरवाले भी बहुत खुश थे। पाँच साल बाद जाॅब पर जाने के कारण पता नहीं वह अपना बेस्ट दे पाएगी या नहीं, इस बात का उसे डर था। पर महीनेभर में ही वह सब काम अच्छे से सीख गई। जो काम करने में अन्य कर्मचारी हफ्ता लगाते, वह दो ही दिन में कर देती। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि जब सबकुछ इतना अच्छा है तो परेशानी किस बात की।

उसने आगे बताया कि कंपनी के मैनेजर-बाॅस उससे खुश रहते हैं और उसकी प्रशंसा भी करते हैं। उसकी बातें मुझे कुछ समझ में नहीं आ रही थी। मैंने पूछा,  जब सबकुछ इतना अच्छा है तो दुख किस बात का। उसने कहा कि उसे कार्य में आनंद की अनुभूति ही नहीं होती। कंपनी के सहयोगी उसे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। बाॅस तारीफ तो करते है पर कंपनी के कार्य से बाहर जाना हो या कोई अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य तो अपने चाटुकार का ही चुनाव करते हैं। जब आप किसी के बारे में कहते हैं कि वह कामचोर है तो भला उस व्यक्ति को इतना महत्त्वपूर्ण कार्य कैसे दे सकते हैं। वास्तव में उन लोगों की ये राजनीति उसे समझ में नहीं आ रही थी। ऐसा नहीं है कि वहाँ कोई उससे बात नहीं करता है। कुछ लोग थे, जो अन्य सहयोगियों के व्यवहार की निंदा करते थे पर साथ ही उनके व्यवहार में भी स्वार्थ ही छिपा हुआ था।

उसकी बातें मुझे बहुत अटपटी लग रही थी पर मैं किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले पूरा किस्सा सुनना चाहती थी। आगे उसने बताया, जहाँ आप सुबह के नौ बजे से शाम के छः बजे तक हो अर्थात आधा दिन गुजारते हो, वहाँ आत्मीयता बेहद जरूरी है। आज लोग बहुत स्वार्थी हो गए हैं। जब जरूरत होगा तो आपके आगे-पीछे दौड़गे और काम निकल जाने पर आपको पूछेंगे भी नहीं। मैं उसकी बातों का मर्म कुछ-कुछ समझने लगी कि उसे काम से नहीं लोगों की बेरुखी से तकलीफ थी।

 दूसरे दिन जब मेरी उससे मुलाकात हुई तो वह बहुत खुश दिख रही थी, पूछने पर पता चला कि उसने नौकरी छोड़ दी। उस दिन मुझे लगा कि जो बंधन पाँव की बेड़ी बन जाए उसे तोड़ देना, बेहतर है। आज वह मुझे आजाद परिंदे जैसी लग रही थी, जो पिंजरे को तोड़ आकाश में ऊँची उड़ान भरने को आतुर थी। यद्यपि मैं उसकी बातों को समझ नहीं पाई पर उस दिन मैंने जाना कि दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके लिए आत्मसंतुष्टि बहुत मायने रखती है। जिस काम को उनकी आत्मा गवाही नहीं देती, अगर ऐसा काम वह पकड़ भी ले तो भी उसे ज्यादा दिन ढो नहीं सकते।


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