Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy Others


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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आहत, पति या पत्नी?

आहत, पति या पत्नी?

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परंतु बापू, माँ तो कहती है कि हम, उनके अमीर होने से, गरीब नहीं हैं!  यह सुन, मैं असहज हुआ था।  

दरअसल, लॉक डाउन के होने से इन दिनों, मुझे, अपने बच्चों से, बैठकर बात करने की फुरसत मिली हुई थी।

ऐसे ही आज भी, मैं, अपने पाँच बच्चों को, अपने साथ, फर्श पर चटाई बिछाये, लिए बैठा था। 3 से 10 बरस के, मेरे 4 बच्चे, मुझसे बात कर रहे थे, जबकि पाँच माह की बेटी, मेरी गोद में थी। पत्नी, शबनम कमरे से लगी रसोई में थी। इस वार्तालाप में ही, मेरी दस वर्ष की बेटी ने, मेरे कहने को, उपरोक्त वाक्य कह कर, काटा था। बेटी के ऐसे कहने के पूर्व, मैं बच्चों को बता रहा था कि अमीर लोग, हमें लूटते हैं, इसलिए हम गरीब हैं। 

अपनी चिढ़ छुपाते हुए, मैंने कहा था,बेटी, माँ को ठीक पता नहीं है।हममें, ऐसी ही बहुत और भी बात हो रहीं थीं। ऐसे ही, मैंने बोला था,

यह देश, हमें कुछ देता नहीं है, जबकि हम गरीब, जी तोड़ मेहनत करते हैं। इस पर, मेरे आठ वर्षीय बेटे ने, तपाक से बोलकर, मेरी बात, फिर काट दी थी कि बापू, माँ तो कहती है, दुनिया में, भारत से अच्छा कोई देश नहीं!

तभी, शबनम सभी के लिए पोहा और चाय लेकर आई थी। वह सीधे मुझे नहीं देख रही थी, मगर बेटे की ओर, प्रशंसा से देख, मुस्कुरा रही थी।

उसकी, यह मुखमुद्रा, मुझे, अपनी हँसी उड़ाती सी लगी थी। मैं, तिलमिलाया था। लेकिन किसी तरह अपने गुस्से को, मैंने काबू किया था।

इसके बाद, शबनम दिन भर सहज रही थी। जबकि मैं, उससे अनबोला सा रखते हुए, रात में उसे सबक सिखाने की तरकीब सोचता रहा था।

शबनम, मुझसे ज्यादा पढ़ी थी। उसने बी ए तक की, पढ़ाई की हुई थी।  शबनम, ज्यादा पढ़ी लिखी होने पर भी मगर, धूर्तता में, मेरे सामने कहीं टिक न सकती थी। रात, बच्चे सो चुके तब, अपनी चाल में मैंने, शबनम को फँसाना शुरू किया - हँसते हुए कहा, शबनम, तू बच्चों की जानकारियाँ बहुत अच्छी तरह से, बढ़ा रही लगती है। मेरी चाल से अनभिज्ञ, फँसते हुए शबनम बोली,

जी, अब पढ़ने लिखने का फायदा, औलाद को ही न दे सकूँ तो, किस काम का मेरा पढ़ना लिखना उसके मन में क्या भरा है, और जब मैं काम पर जाया करता हूँ, तब बच्चों को क्या सिखाती, पढ़ाती रहती है, इसका जायजा लेने, मैंने फिर झूठे ही तारीफ करते हुए कहा था,हाँ, शबनम देख, तू उन्हें कैसा होशियार बना रही है, अभी आठ, दस की उम्र में ही, मेरी बात काटने लगे हैं, बच्चे।

तब उसने मेरे मंतव्य को बिना भाँपे कह दिया, देखिये, आप, गलत भी तो कह रहे थे। हमारे गरीब होने में, अमीर कहाँ जिम्मेदार हुए? 

और इस देश पर लानत-मलानत कैसी, जो आपको, कई कई औलादें पैदा करने की छूट देता है।   

अब अगर, हमारे अभाव हैं तो उसमें देश और अमीर क्या करें? वे अमीर, एक दो बच्चे करते हैं, अपने बच्चों को, बेहतर शिक्षा और सुविधा देते हैं। हम, पाँच पैदा करते हैं और फिर हमारी सीमित आय, इनकी शिक्षा और सुविधा पर ज्यादा में बँट जाती है। 

शबनम के इस उत्तर से, मैं समझ पा रहा था कि, दो बच्चों के बाद, शबनम, और बच्चे नहीं चाहती थी। लेकिन मैंने, उसकी चलने नहीं दी थी। इससे दबा रोष ही मेरे उकसाने पर आज उसकी बातों में छलक रहा है।

मैंने, धूर्तता जारी रखी, फिर हँसते हुए उसको उकसाया -वाह शबनम, सही बात कह रही है तू। लगता है, सरकार द्वारा औरतों के हक़ में लाये प्रावधानों से तू उस पर फ़िदा है। लगता है तू, पिछले चुनाव में बटन भी, इन्हीं का दबाकर आई है। 

शबनम, लगता नहीं था, कि मेरे उकसावे को समझ नहीं रही थी। लग रहा था जैसे, आज वह मन में भरा, कह देना ही चाहती थी।

वह बोल पड़ी -हाँ, सही कहते हैं आप, मैंने, इन्हीं का बटन दबाया था।    

बात यह नहीं कि, किसकी सरकार है। बात यह है कि, आप पर तो मेरी चलती नहीं। लेकिन बच्चों के मन में, मैं, वह जहर क्यूँ भरूँ कि और लोग ख़राब हैं, यह देश अच्छा नहीं। हमारे बच्चे, जिस परिवेश में पल-बढ़ और पढ़ रहे हैं, उसमें, जो काम इन्हें मिलेगा, वह करते हुए, देश और यहाँ के अन्य लोगों के प्रति उनके मन में जलन और बैर रखना उनके लिए ठीक न होगा। ऐसे क्लेश के साथ जीने में तो, उनका जीना और दुःखकारी ही होगा। 

अगर सही तरह की सोच. उनके मन में रहेगी तो ऐसी ईर्ष्या उन्हें नहीं होगी। फिर वे यदि कम भी कमायेंगे तो भी, संतोष रख सकेंगे और ज़िंदगी को ज्यादा मजे से जी सकेंगे। इसलिए जो विषम परिस्थितियाँ, हमारी गलत सोच से उन्हें मिली हैं, उसके साथ ही उनका नज़रिया भी गलत कर देना, मेरी माँ वाली ममता के, विरुद्ध कार्य होगा। 

मेरी आपसे भी यही विनती है, जो भूल आप कर चुके हैं, उसकी वहीँ रोकथाम कर दें। अपनी भूलों का सिलसिला, यूँ ही नहीं जारी रहने दें। 

सुबह से ही मेरे भीतर का आहत (पुरुष) पति  यही बहाना चाहता था, मैंने उसके बाल पटाये थे और दो तमाचे रसीद किये थे उसके गालों पर - चिल्लाते हुए कहा था -

ओये पढ़ी लिखी, चुप कर, पलती तो मेरी ही कमाई पर है। औरत है औरत जैसी रह, मर्द होने कोशिश मत कर। मेरे कहने पर वोट नहीं देती (गलत बात कहते हुए, फिर मेरा स्वर मुझे ही खोखला लगा था, आगे कहा था) और बच्चों को मेरे विरुद्ध बोलना सिखा रही है।

फिर पूरी ताकत से दो धौल उसकी पीठ पर और जमा दिये थे।

शबनम रोते हुए इतना ही बोली थी -

मुझे सुबह से ही मालूम था कि आज आप मुझे पीट कर ही शांति पाओगे। फिर सुबकते हुए बच्चों के बगल में चटाई पर जा लेटी थी।

मैं देर रात तक न सो सका था। सुबह से रात तक की बातों में मुझे तथ्य नज़र आये थे। शबनम सही ही तो कहती है,मुझे अमीर होने से रोकता कौन है, शायद मेरी गलत सोच और गैर जिम्मेदार आचरण, बहुत हैं ऐसे जो इसी देश में, जीरो से हीरो हुए हैं। 

मैंने तब निर्णय किया कि अब और बच्चे पैदा नहीं करूँगा और उनकी परवरिश, शबनम के विचार अनुसार होने दूँगा, हो सकता है, इनमें से कोई अंबानी निकल जाए।

लेकिन यह भी तय किया कि प्रत्यक्ष में पति वाली हेकड़ी बनाये रखूँगा, नहीं तो, शबनम मेरे सिर पर सवार होगी और अड़ोस-पड़ोस मेरी हँसी उड़ायेंगे ... 


 





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