STORYMIRROR

Pankaj Kumar

Classics

4  

Pankaj Kumar

Classics

ये ज़िन्दगी तेरी मेरी

ये ज़िन्दगी तेरी मेरी

1 min
379

बूँद बूँद सी है बह रही 

पत्ता पत्ता है गिर रही

लम्हा लम्हा है गुजर रही 

है हाथ से फिसल रही 

ये ज़िन्दगी तेरी मेरी 


कहीं काँटों पर है चल रही 

कहीं फूलों सी है खिल रही

कभी रात में मुर्झा रही 

फिर कली बन कर है आ रही 

ये ज़िन्दगी तेरी मेरी 


कहीं कड़कती धुप सी चमक रही 

काली घटाओं सी भी है छा रही 

कहीं गरज घनघोर कर 

मंद मंद बूंदे है बरसा रही 

ये जिंदगी तेरी मेरी 


कभी ख्वाब सुनहरे है दिखा रही 

मुश्किल राहों से है डरा रही 

कभी ख़ुशी के गीत सुना रही 

विरह के राग भी है गा रही 

ये जिंदगी तेरी मेरी 


ये जिंदगी ना एक सी थी 

और ना कभी रहेगी 

जैसे चलती आयी है

वैसे ही बहेगी 

जो भी पल आये

जैसा भी कल आये 

बस चलते चलो मुस्कुराये 


क्यों कि...  

इक दिन बीत ही जाएगी 

फिर हाथ ना आएगी 

ये जिंदगी तेरी मेरी 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics