ये भी होना था (Prompt-7)
ये भी होना था (Prompt-7)
दिल की इक तमन्ना थी
हटकर कुछ ऐसा करूँ
दुनिया भी हो मजबूर सोचने को
किसने किया है ये कारनामा
बंद कमरे में हो गया क़ैद
बैठाके तन्हाईयों को सिरहाने के पास
था मशगूल में अपनी धु न में
कुछ अधूरे सपने, कुछ अधपके काज
इनको भी पंख लगाने थे
कुछ अनदेखे ख्याल, कुछ अनकहे किस्से
जिनकी पटकथा अभी बाक़ी थी
दिन का चैन, रातों की नींदें भी थी
मुझसे नाराज, मगर इक जुनून था जो
देकर तसल्ली होंसला बढ़ाता
इधर अड़ा था मैं भी जिद्द पर
कुछ तो करना है, वह भी कुछ अलग
आखिर दिन वह भी आ गया
जिसका था मुझे सालों से इंतज़ार
बना डाली ऐसी मशीन
जो बिखरे इंसानी रिश्तो को
जोड़ने की रखती थी ताकत
शायद इस पर थी किसीकी बुरी नज़र
आकर कोई प्राणी अनजान गृह से
उड़ाकर ले गया अपनी चोंच में
इस करामाती मशीन को, मैं देखता रह गया
इतना असहाय, इतना लाचार
शायद पहले कभी न था ज़िन्दगी में ।
