STORYMIRROR

विनोद महर्षि'अप्रिय'

Romance

4  

विनोद महर्षि'अप्रिय'

Romance

यादें

यादें

1 min
286

क्यों तू मुझे इस तरह तन्हा कर जाती है

ख्वाब टूटते ही बस तेरी यादें ही रह जाती है

ना सह सकता तेरे मेरे बीच जो यह दूरी है

एक तू ही अच्छी है यह दुनिया बहुत बुरी है।


हरपल मेरे मष्तिष्क में बस तू ही रहती है

तेरे बिना यह दुनिया मुझे वीरान लगती है

कहाँ है किस डगर तुझे अब तलास करूं

मेरे ख्यालों में हरवक्त बस तू ही रहती है।


हर आहट मुझे तेरी ही याद दिलाती है

हृदय में कुछ इस तरह तू बस गई है

एक फासला जो तेरे मेरे दरमियान है

कर दिल मे चोट अब तू कहाँ खो गई है।


खो गया हूँ मैं अब तेरी झील सी आंखों में

नजर का क्या कसूर है तू एक है लाखों में

यादों का यह गहरा घाव नासूर ना बन जाये

बस जा आकर सांसो मे यह डोरी टूट ना जाये।


स्वांस अटकी है करने को तेरा दीदार अब

टूटती इस डोरी को आकर थामेगी तू कब

समा जा मुझमे कुछ यूं तू ज्यो जल गागर में

कर मिलन इस तरह ज्यों मिलती नदी सागर में।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance