STORYMIRROR

विनोद महर्षि'अप्रिय'

Others

3  

विनोद महर्षि'अप्रिय'

Others

राज़ ए गम

राज़ ए गम

1 min
237

गमो के मटके में एक घूँट जब जुड़ी

सोचा पाप का घड़ा अब फुट जाएगा

क्या पता था की दुनिया इतनी बुरी है

यकीन था जो वही धागा टूट जाएगा।।


आखिर हम भी तो वही दिल रखते है

मासूमियत और प्यार जिसमे सहेजते है

जख्म देना तो अब एक दस्तूर है बस

जुबाँ पर प्यार दिल मे छलावा रखते है।।


कहते है कि अपने ही राज को जानते हैं

आज तो हम भी इस बात को मानते है

दिलों में छुपाते भी तो इस कदर है कि

इक विकट मोड़ पर गमो से मिलाते है।।


मुझे पसन्द है दुश्मन भी खुले मैदान में

पीठ पीछे वार दिल का नासूर होता है

उसूल अब तो बस यही बाकी है जहां में

एक साथ बैठना भी अब कसूर होता है।।





विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन