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Pradeep Rajput "Charaag"

Romance

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Pradeep Rajput "Charaag"

Romance

वो इक विरहन

वो इक विरहन

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वो इक विरहन 

सांझ ढ़ले चौख़ट पर बैठी 

उसका व्याकुल आतुर मन

राह निहारे अपने प्रियतम की 

वो कब आएंगे...कब आएंगे। 

शहर से, थके - हारे से होंगे। 

देखूँ शायद कहीं वो तो नहीं 

आँखों में दूर तलक 

ठहरा सा कोई, 

बातें अनगिनत ख़ुद से पूछे 

कब आएँगे...कब आएँगे 


जब भी गुज़रे कोई 

दरवाज़े से मुसाफ़िर 

धुआँ धुआँ धुँधली 

फ़िर सुबह सी साँझ, 

टकटकी लगाकर देखती 

गलियों की एक छोर से

दूसरी ओर, 


पास से गुज़री तो कुछ जानी 

कुछ अनजानी सी खुश्बू  

वो हवा घुल मिल के आई है 

जिसकी छुअन से गेसुओं ने 

चेहरा ढक दिया लाज के मारे, 


फ़िर तन मन ये थिरक उठा

अंगड़ाई भरने लगीं वादियाँ 

आसमान में बादल छाने लगे 

पपीहा पिहू पिहू गाने लगा 

अमुआ की डाली लहराने लगी 

उसपे बैठी कोयल गाने लगी। 



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