STORYMIRROR

Anjali Srivastava

Romance Tragedy

4  

Anjali Srivastava

Romance Tragedy

विरहणी की विरही सफर...

विरहणी की विरही सफर...

2 mins
16


सुन विरह व्यथा एक विरहणी की ओरी

जो थी दीवानी अपने साजन की चोरी

सांवला सा मुख लेके गोरी

ओढ़ चुनर वो कोरी कोरी

लाल रंग का जो आई लेके रोरी

घुंघट का पट खोले गोरी

भरवाने सुनी मांग जो थी कोरी।


उड़ चली पुरवइया ढूंढने जो पिया

पुकारती रही वो व्याकुल था उसका जिया

चल रही थी सासें उसकी

आशा का जल रहा था जो दीया

नव यौवन पे श्रृंगार प्रकृति ने जो किया

प्रिय के न मिलने पर आसुओं ने धुल दिया।


तरसते नैन उसके ढूंढते ही रह गए पिया

झूमे जुल्फो सा बादल मस्त लहराता आंचल

हार बना श्वेत हंसो का दल

बिजली बन चमके बिंदिया जब जब गरजे थे बादल

पैरों में पायल सा लहका कुमुदो का दल

हाथों में चुड़ी बन छनका बेला का फल

विरह व्यथा ज्ञात हुआ सुन नदियों की कल कल

विरही आग पता चली जब वर्षा सावन का बादल।


पूछ रही थी पता गोरी हर आंगन में बरस

मुस्कुरा रहे थे चेहरे आया ना उसपे किसी को तरस

देख रही हूं कब से ये हो गया कितने बरस

क्या बगिया क्या शीश महल चाहे हो वो सहर

ढूंढती वो चली कभी बरसी वह तड़प

कभी शांत दुखी भावों से कभी पूछी वो कड़क।


न जानती थी बावरी न पूछी थी कुछ वो

न सोचा था उसने कभी खो देगी उसको

एक डर लिए थी चुप खड़ी

पलके बिछाए इंतजार में सासों से थी वो लड़ी

जग छोड़ेगा क्या जब खुद किस्मत साथ न दी

वो प्यार ही क्या जिसमें सिर्फ तन्हाई थी

वो सफर, सफर क्या जिसमें हमसफर की थी कमी

बस विरहणी की विरही सफर ही रह गई।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance