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Anjneet Nijjar

Tragedy


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Anjneet Nijjar

Tragedy


विमूढ़

विमूढ़

2 mins 155 2 mins 155

दुनिया बैठी

तबाही के ढेर पर,

मर रहा इंसान,

छोटा सा इक वायरस,

ले रहा है सबकी जान.

काम-धंधे उजड़ गए सब,

सब कुछ हुआ बेजान.

गूंगे-बहरे, अंधे बने रहो विमूढ़ों

और बोलो जय श्री राम!

आम आदमी हुआ

गरीब, असहाय, बर्बाद

औ निकली अनेकों जान,

इकनॉमी का बैठा भट्ठा

तब भी डींगें हांक रहे

महाबली-बड़बोले श्रीमान.

गूंगे-बहरे,अंधे बने रहो विमूढ़ों

और बोलो जय श्री राम!!

स्कूल-कॉलेज सब बंद पड़े,

शिक्षा हो गई चौपट,

न कोई नीति, न ही न्याय,

हर किसी का हुआ जीना हराम,

गूंगे-बहरे,अंधे बने रहो विमूढ़ों

और बोलो जय श्री राम!!

बीमारी झेलें, गरीबी झेलें,

हर गड़बड़, हर घोटाले झेलें,

और तुम्हारे राज में कितना,

आह-कराह भरें श्रीमान

गूंगे-बहरे,अंधे बने रहो विमूढ़ों

और बोलो जय श्री राम!!!

मूर्तियां बनाओ, मंदिर बनाओ

अस्पताल मत बनवाना,

न सोचना किसी गरीब का

कल्याण-उत्थान,

बीच सड़क पर मर रहे लोग,

तुम पत्थरों में ढूंढो भगवान,

गूंगे-बहरे,अंधे बने रहो विमूढ़ों

और बोलो जय श्री राम!!!!

मंदिर-मस्जिद से क्या होगा-

कोई मुझे तो यह समझा दो,

बेरोजगारी हटेगी, अर्थव्यवस्था सुधरेगी

शिक्षा बढ़ेगी, इलाज मिलेगा-

क्या मिलेगा सबको ज्ञान-विज्ञान?

गूंगे-बहरे,अंधे बने रहो विमूढ़ों

और बोलो जय श्री राम!!!!


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