उस की कमीज़
उस की कमीज़
समय ने ऐसी करवट ली
कि उसकी कमीज़ से
"अहम् त्वम् अस्मि" की
खुशबू अब आती नहीं ।
उस कमीज़ को छूने से
सुकून मिलता नहीं ।
चाह कर भी उसकी याद
मुस्कुराहट बिखेरती नहीं ।
उसके स्पर्श से प्यार का
एहसास होता नहीं ।
उसकी प्यारी-प्यारी बातें
दिल तक पहुँचती नहीं ।
फिर भी उसकी आँख का
आँसू मेरी आँख से गिरता ।
क्यों उसकी आवाज सुनते
ही हृदय पिघल उठता ।
उसकी बातों पर यकीन
करने को दिल करता ।
पर फिर कमीज़ पर
पड़ी सलवटे मिलती ।
तो इस दिल को
तार-तार कर जाती ।
मैं धरा-सी उसके
इर्द-गिर्द घूमती ।
पर उसने अपने इर्द-गिर्द
एक नई दुनिया बसा ली ।
अब उसकी कमीज़ से
उसकी खुशबू आती ।
जो मेरा रिश्ता उस
कमीज़ से तोड़ गई ।
और मेरी इस्त्री कहीं
दुबक कर बैठ गई ।
फिर भी अपने रिश्ते की
कमीज़ अच्छे से तह कर दी ।
जब भी वो उसे पहने
तो सलवटे न मिले ।
खुशबू न सही पर
अपनापन तो मिले ।

