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Devendraa Kumar mishra

Romance

4  

Devendraa Kumar mishra

Romance

तुम्हारी हँसी

तुम्हारी हँसी

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202

छम छम करते बज रहे हो 

एक साथ जैसे सैकड़ों घुँघरू 


टप टप करते बरस रहे हों आसमान से सच्चे मोती 

संतूर और जल तरंग की सुरीली आवाज तुम्हारी हंसी 


लगता है जैसे परमात्मा हंस रहा हो तुम्हारी हंसी में 

हंसती हो तुम, छा जाती है मुझमें सूफियों की मस्ती 


और मन की बस्ती में जल उठते हैं हज़ारों दिए 

इतनी पावन इतनी निश्चल, पवित्र और प्यारी तुम्हारी हंसी 


भेद कर रोम रोम मेरे मन और मस्तिष्क पर

छाने लगता है अजीब सा सुरूर 


तुम्हारी हँसी की अपनी हस्ती है 

तुम्हारी मुस्कान में ही मेरी दुनियां बसती है।


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