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Dr.Deepak Shrivastava

Romance

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Dr.Deepak Shrivastava

Romance

तुम्हारा श्रंगार

तुम्हारा श्रंगार

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तुम करती हो श्रृंगार

 किसके लिए

तुम पहनती हो

कंचन हार

किसके लिए

तुम मुस्कुराती

खिलखिलाती हो

किसके लिए

तुम्हारा प्यार

तुम्हारा श्रृंगार

करती थीं 

हमें प्यार

जिसके लिए

हम रहते

थे बेकरार

तुम्हारी सादगी

जिस पर हम

 थे निसार

आ जाता था

तुमपे निखार

जब तुम

शर्मा कर

झुका लेती

थीं नजर

उन पलकों का

उठना गिरना

कर देता था

हमको घायल

जिन पर 

हो जाते थे

हम निहाल

उसी सादगी से

करादो अपना दीदार

तुम्हे नहीं किसी

आईने की

किसी श्रृंगार की

हमारे चाहने से

तुम्हारे चहकने से

आ जाएगी हमारे 

गुलशन में

बहार

खिल उठेंगे फूल

महकने लगेगा

मेरा संसार 

वो ही होगा

तुम्हारा श्रृंगार।


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