तेरा साथ दो शब्द
तेरा साथ दो शब्द
वन के पल
हर क्षण में, बस तेरा ही साथ रहे
श्वांस आखिरी छूटे
तब भी हाथ में तेरा हाथ रहे
तेरे सीने की
धड़कनों में, जब भी मैं खो जाती हूं
तेरी बाहों मैं
सब खोकर भी चुपके से सो जाती हूं
सच कहती हूं
उन पलों को व्यक्त कहां कर पाती हूं
उन यादों को
दिल दीवार पर उकेर कर चित्र सजाती हूं
मेरे प्रेम वृक्ष का
यूं ही हरदम, हरा भरा हर पात रहे
श्वांस आखिरी छूटे
तब भी हाथ में तेरा हाथ रहे
वो आंखों के देखे सपने,
जब बन कर आये थे अपने
कुछ कहने की चाहत में
नयन झुके लगे अधर थे कंपने
वह तारों से भरी सांझ
और उन चांदनी बिखरती रातों में
तन न जाने क्यों
जलता था, उन रिमझिम सी बरसातों में
तेरी होंठो की
मुस्कानें, दुख को देती हरदम मात रहे
श्वास आखिरी छूटे
तब भी हाथ में तेरा हाथ रहे
जीवन के पल
हर क्षण में, बस तेरा ही साथ रहे
श्वास आखिरी छूटे
तब भी हाथ में तेरा हाथ रहे।

