सुन ए जिंदगी
सुन ए जिंदगी
कोई गिला नहीं कोई शिकवा भी नहीं
मगर कुछ सवाल अभी बाक़ी हैं
जिनका जवाब चाहिए तुझसे ए ज़िन्दगी
बस तुझसे मिलने का बहाना ढूँढ़ रहा हूँ
चलते चलते बहुत मुसाफिर मिले
कोई अपना तो कोई पराया मिला
मिला नहीं मगर कोई तुझसा ए जिंदगी
सफर में तुझसा कोई दीवाना ढूँढ रहा हूँ
दिल में सजा कर रखे हैं अब तलक
दर्द जो मिले थे तुझसे विरासत में
वही वक़्त फिर से लौटा दे ए ज़िन्दगी
तेरे साथ गुजरा वह ज़माना ढूँढ़ रहा हूँ
बेशक तुझे याद न हो मुझे याद है
मेरी बदनसीबी पर तेरा वह मुस्कुराना
तेरी गुस्ताखियाँ भुला नहीं ए ज़िन्दगी
तेरे भीगे लबों पर वही तराना ढूँढ रहा हूँ
चलते चलते पांव अब दुखने लगे हैं
दिल के गहरे ज़ख्म किसको दिखाऊँ
मिट जाएँ सारे ग़म जिधर ए ज़िन्दगी
रात के अंधियारे में वह मैखाना ढूँढ रहा हूं।
