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Satyawati Maurya

Abstract Tragedy Classics

4.6  

Satyawati Maurya

Abstract Tragedy Classics

स्त्री

स्त्री

3 mins
296


लछमी सिर पर कपड़ों की पोटली रखे एक हाथ से पाँच वर्ष की बेटी गुनिया के हाथों को थामे अपने अन्य संगी- साथियों के साथ गाँव की ट्रेन पकड़ने स्टेशन की ओर चली जा रही थी।

सरकारी लॉकडाउन ने इन ग़रीबों की ज़िन्दगी में ही जैसे लॉकडाउन लगा दिया।सब थम -सा गया, साँसें भी या तो उखड़ रही थीं या थम रही थीं कुछ लोगों की।

आख़िर लछमी कितने दिन सरकार का मुँह देखती या किसी और का कि लोग उसको खाना -पानी देंगे।सो चल पड़ी थोड़ा सामान बांध कर सबके साथ, वो लोग उसके गाँव के ही थे।

वो तो अच्छा था जीते जी रेल के किनारे एक घर पति ने बनवा दिया था। पति के मरने पर वह गाँव नहीं गई, यहीं रह गई।पति के रहते बड़े कष्ट झेले पर उसके जाने के बाद लोगों की बिगड़ती नीयत ने उसे चौकन्ना कर दिया था। और तब 500 रुपया एक पड़ोसन से उधार ले ट्रकों के आगे -पीछे लगने वाले ऊनी काले -रंगीन चोटीनुमा फुँदने बना कर सड़कों पर बेचने लगी।घर ख़र्च के बाद बचे पैसों से बच्चों की काली -सफ़ेद चूड़ियाँ( नज़र से बचाने वाली )और काली मणियों की चूड़ियाँ बना कर बेचने लगी। धीरे-धीरे उसकी टोकरी में कंघी, क्लिप, जूं की कंघी, बालों के रबर भी जुड़ते गए।अब बचत भी ज़्यादा करने लगी थी।

उसकी हिम्मत की लोग दाद देते कि बड़े ज़िगरे वाली है। मर्दों से उसकी पाँच फुट की दूरी हमेशा बनी रहती।जब भी मिलती राम राम के साथ चाचा, ताऊ, भाई या बेटा बना कर ही बात करती।वह ख़ूब पहचानती थी इन नज़रों को।इसलिए कमज़ोर नहीं पड़ना चाहती थी।

बस एक ही सपना था बेटी गुनिया को पढ़ाना और सक्षम बनाना।अपने जैसे अभागे जीवन से दूर उसका भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहती थी।पर इस नासपीटी बीमारी ने उसके सपनों पर पानी फेर दिया।हताश तो हुई पर हिम्मत नहीं हारी उसने।

माँ है वह हार कैसे मान सकती है ? बेटी को लेकर देखा सपना उसकी आँखों में रौशन हो आँसुओं में झिलमिला रहा था।अधूरे सपनों में टीस- सी हुई, पर दिल में गजब की हिम्मत ने करवट बदली।

कुछ चिंता नहीं बस ठिकाना ही तो बदला है। ये पराया शहर था पति के साथ आई, उसके मरने के बाद, जीने का रास्ता भी निकाला पर, , , पति आधे रास्ते साथ छोड़ गया।मजबूरी में तब उसने शहर को अपना लिया था पर शहर ने उसे नहीं अपनाया तो उससे अब कैसा मोह?जड़ें तो अब भी गाँव में ही है, उसे फिर से हराभरा कर लेंगे, हिम्मत है, हाथों में दम भी है। विश्वास था कि गाँव दोनों हाथों से उन्हें अपना लेगा। फिर से वो गुनिया को लेकर देखे गए सपने को पूरा करने में जुट जाएगी, , सोचते हुए उसने झट से पोटली को ट्रेन में रख दिया, फिर गुनिया को चढ़ाया, अपना घाघरा और सर की ओढ़नी सहेजती हुई वह ख़ुद भी लपक कर चढ़ गई। 


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