सर्दी की शाम
सर्दी की शाम
उस पार ढलता सूरज उफनती नदिया में समा रहा
मेरी बची खुची उष्णता भी साथ लिए जा रहा
एक सिहरन उठी रोम रोम में कँपकँपी सी भरी
सर्द हवा के झोंके से तन की ठिठुरन भी और बढ़ी
ओह क्यों निकली घर से, ऐसी भी क्या मजबूरी थी
सर्दी की यह शाम, गरम चाय की प्याली जरूरी थी
नुक्कड़ की उस दुकान पर मैं अचानक बढ़ती गई
उड़ती गरम भाप और सुगंध मुझे खींच रही
सहसा नज़र आई वहीं एक नारी पास आती
फटे चीथड़ों से ही बदन को अपने वह छिपाती
'पगली है वह उससे जरा बच के ही निकलना'
एक नहीं वहाँ हर किसी का यही कहना
पल भर को नज़र मिली मैं जैसे सिहर उठी
सर्दी की मार उस पे, मेरी चेतना थी जगी
जाने कैसे मैंने उससे चाय को था पूछ लिया
दर्द उमड़ा आँखों में, मैंने जिसे पढ़ भी लिया
पगली नहीं है यह नारी, वक्त की कोई है मारी
ओढ़ पागल का लिबास बचती फिरे बेचारी
पागल तो दुनिया है जो इसे दीवानी कहे
न जाने कितने ज़ुल्म सितम इसने होंगे सहे
एक प्याली चाय से दर्द भला कम होगा?
मानवता सोए नहीं प्रयत्न ये करना होगा
नारी के सम्मान को कोई झिंझोड़े नहीं
समाज को जगाने का संकल्प करना होगा।।
