सपनों का घर
सपनों का घर
प्यार से नज़र मिलाथी मैने वो,
रूठकर चले गये,
सुंदर था सपनों का घर मेरा वो,
वीराना बना गये।
सपनों का घर सजाया था मैने,
दिल के अरमानों से,
अरमानों की होली बनाकर वो,
सपनों को खाक कर गये।
नींव की ईंट गहरी डाली थी मैने,
सपनों के घर के लिये,
इस घर को सुनसान कर के वो,
मेरे दिल के टुकडे कर गये।
प्यार उसको दिल से किया था मैने,
सपनें सच करने के लिये,
सपनों का घर खंडहर बनाकर वो,
"मुरली" की कब्र रचा गये।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

