तेरी खामोशी
तेरी खामोशी
तेरी खामोशी मुझे जीने नहीं देती है,
मुझे हरपल मायूस बनाती रहती है।
मै तुझे मनाने की कोशिश करुंँ तो भी,
तू हमेशा मुंँह मोडकर बैठी रहती है।
अगर मेरा कसूर मै कबूल करता हूंँ,
तू आंखों से अंगारे बरसाती रहती है।
मेरी दर्दभरी पुकार तू सुनती है तो भी,
तू पत्थर दिल की मुझे दिखाई देती है।
तेरे हर ख्वाब मैं हमेशा पूरा करता हूंँ,
मेरे इश्क को तू महसूस नहीं करती है।
मेरे दिल की धड़कन तू सुनती है तो भी,
तू धड़कन का ताल बेताला करती है।
मै तेरे इश्क की गज़ल गाया करता हूंँ,
तेरी खामोशी मेरा सूर बेसूरा करती है।
कब तक तू खामोश रहेगी ओ जानेमन,
"मुरली" को कफ़न क्यूंँ बनाती रहती है?
रचना :-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

