युध्ध से हालात
युध्ध से हालात
युध्ध के साये में शांति कहीं दिखाई नहीं देती,
प्रेम की धड़कनें दिल में कहीं सुनाई नहीं देती,
खून के फौवारों से सब लिखतें रहे है इतिहास,
मानवता की बहती धारा कहीं दिखाई नहीं देती।
तलवारों के टकराव से सपनों का महल तुट गया,
प्रेम की प्रजल्वित ज्योत कहीं दिखाई नही देती।
युध्ध में विजय प्राप्त कर के भी सब हार गये सदा,
विजय की महफ़िल में खुशी कहीं दिखाई नहीं देती।
मिसाइलों से हमला कर के आसमान लाल हो गया,
चांद के किरनों में शितलता कहीं दिखाई नहीं देती।
मौत के तांडव में त्राहिमाम हुआ है सारा आलम,
तुटे हुए सपनों की किंमत कहीं दिखाई नहीं देती।
युध्ध से क्या मिला यह पुछ रहा है आज "मुरली",
मानवता की पहचान कहीं भी दिखाई नहीं देती।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
