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Smita Singh

Tragedy

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Smita Singh

Tragedy

संदूक्ची

संदूक्ची

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ख्वाहिशों ,अरमानों,बचपन की अठखेलियों की तहे लगाकर,

इक संदूक्ची मन के गिरहों की ,विदाई की बेला में थमाकर ,

सुखी गृहस्थ जीवन के ताले को लगाकर,

माॅ ने अपने जीवन के निचोड़ की सीखों की चाबी थमाकर जब बन्द करने को कहा था।

क्या कहूं ?उस दिन लहु रगो का ,रंग बदलकर आंखो से बहा था।


कहना चाहती थी ,अम्मा!ना झोंकों मेरे अस्तित्व को विछोह के इस पल में,

तुम्हारी आत्मजा हूं ,कैसे छोड़ रही हो?मीठे पानी की इस मछली को उस खारे जल में,

रूंधे गले में शब्दों के अर्थो ने धूमिल होकर ,मन के कोनों पर कोहरा बनकर छा गये,

आंखों से बरसते आंसूओं के साथ ,नवजीवन के उस पथ पर हम वो बंद संदूकची लेकर आ गये।

आज जब देखती हूं कोनें में पड़ी उस धूल खाती संदूक्ची के ताले को,

नजर आती हैं त्याग ,समर्पण ,कुर्बानियों की पपङियों के नीचें एक स्त्री के लिये परम्पराओं के जालों को।



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