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ARVIND KUMAR SINGH

Abstract Tragedy

4.7  

ARVIND KUMAR SINGH

Abstract Tragedy

मेरी कविता

मेरी कविता

1 min
80


मेरी कविता के अन्तर्मन में

करुणामयी कशिश है क्यों

हर दिल लाखों गम छुपाऐ

है अनायास मुस्कुराता ज्यों


आश नहीं है कोई किसी से 

बाजी को किस्मत से खेला है

जूझ रहा हर कोई जुगत में 

पार पाने कैसे भी अकेला है 


शातिर तो यहां पर जो भी है

हर कोई उसे पहचानता है

गलतफहमी से रिस्ते बने रहें

इतना भी बहुत है मानता है


जरूर कोई तो पाप बोध है

जो रिस्तों के बीच में आता है

वर्ना भीड़ के बीच अकेला

क्यों हर गम को सहे जाता है


चाहे जैसी प्रलय आ जाऐ

खा जाऐ भले कोई महामारी

दूसरों को भाषण देते रहो

पर छूटे न अपनी मक्कारी


गफलत में रहता जो रहा करे

पर एक दिन तो ऐसा आऐगा

दुनिया को धोखा देता रहा वो

मौत को न चकमा दे पाऐगा।


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