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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Tragedy

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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Tragedy

स्मृति

स्मृति

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जो टूट गया था तेज हवा के झोंके से 

जो छूट गया था क्रूर काल के धोके से


जो बदली बन घुल गया नील से अम्बर में

बूँद खो गयी जैसे बड़े समंदर में


उनको मेरी याद ढूंढ फिर लाती है

रह रह कर पीड़ा जीवित हो जाती है


वक़्त सदा ही अपनी गति से चलता है

घाव दिये हो पर मरहम भी मलता है


जो रक्त पुनः आँखों से बहने लगता है

अन्तर् की पीड़ा को कहने लगता है


तब स्मृतियों में दूर कहीं निकलता हूँ

अब हर क्षण मैं भी सूरज सा ढलता हूँ।


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