STORYMIRROR

Ratna Kaul Bhardwaj

Abstract

3  

Ratna Kaul Bhardwaj

Abstract

समाज एक कठपुतली

समाज एक कठपुतली

1 min
467

यह समाज बन चुका है एक कठपुतली 

और अब सत्ता है बाज़ीगर 

सब कुछ चलता है यहाँ बस एक 

ईमानदारी को छोड़ कर 


कुर्बानियां देकर सदियों की गुलामी 

छोड़ आये थे जो हम पीछे 

विकास ऊंचाइयां छूने लगा पर 

मानसिक पतन भी आया पीछे पीछे 


जनसँख्या,महंगाई,भुखमरी, बीमारी 

दानव की भांति फ़ैल रही हैँ 

भ्रष्ट राजनीती व् राजनीतिज्ञ नीतियां 

बेचारी अवाम झेल रही है 


निरक्षिता,बेरोज़गारी,सांप्रदायिकता,आतंकवाद 

हैँ समाज की यह समस्याएं 

सत्ता में बैठे हुए कितने ही बाज़ीगर 

नहीं हैँ बेखबर वे ,पर अलग हैँ उनकी इच्छाएँ 


हर नुक्कड़ पर नशा बिक रहा है 

और हो रहा है देह का व्यापार

बढ़ती महत्वकांक्षाएँ स्वरुप बदलने लगी हैँ 

बदल रहा है सामाजिक विचार व् व्यव्हार 


वे बाज़ीगर सत्ता के अब 

दलाल खुद ही बन चुके हैं

आम आदमी का हो रहा है शोषण 

हलाल हो रही उसकी इच्छाएं हैँ 


भाषा, जाति, प्रान्त,सांम्प्रदायिकता 

विभिन्न स्वरुप हैँ कठपुतलियों के 

इन धागों की डोर संभाली हैँ  

मन के काले आज के नेताओं ने 


लुट रही है धरती , सिसकते हैं लोग 

जनता मर रही हैं ,किसी को परवाह नहीं 

बस यूं ही जिए जा रही है बिन मकसद 

यह समाज रुपी कठपुतली।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract