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Chandresh Chhatlani

Classics


5.0  

Chandresh Chhatlani

Classics


सिकुड़ा हुआ समय

सिकुड़ा हुआ समय

1 min 274 1 min 274

पृथ्वी की धुरी के इशारों पर

यूं तो नाचता है समय

विस्मृत क्षण हो गए धूमिल

कई दिनों से गुम था समय।


कितने ही वर्षों से ढूंढता

पूछता था जिससे वो कहता

“मेरे पास तो नहीं है समय...”

समय को खोजते खोजते

अपने प्रियजनों के हृदय की

सीमा को भी लांघ गया।


कहीं भी ना मिला समय

हार के लौटा घर में,

आश्चर्यचकित फिर हुआ मैं !

समय तो मेरी मुट्ठी में सिकुड़ा था

मेरे परिवार के हर सदस्य से

मिलने को आतुर था मेरा समय।


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