Poonam Kaparwan
Abstract Inspirational Others
करत श्रृंगार हे ननंदलाला ज्यादा
मनभावन लागत हो
छवि मनमोहक मोरे कृषणा
बलिहारी भयऊँ जाऊँ
नवनील छवि पहन पीताम्बर मसतक मोर मुकुट है
अखियन बंदकर मीरा मैं बन जाऊँगी
बलिहारी मैं जाऊँगी
वो बंसत फिर स...
गुलाबी बहारें
विरहन प्रेयसी
बसंती बहार
प्रकृति का नव...
भँवरा
पीली सरसों
मेरा भारत
संकल्प
फिर एक आवाज अंधेरे में आंखें खोलो कहो जो देखा। फिर एक आवाज अंधेरे में आंखें खोलो कहो जो देखा।
तजुर्बे के मुताबिक़ खुद को ढाल लेता हूं, कोई प्यार जताए तो जेब संभाल लेता हूं. तजुर्बे के मुताबिक़ खुद को ढाल लेता हूं, कोई प्यार जताए तो जेब संभाल लेता हूं...
प्राप्त किए अपने अनुभवों को मन:दर्पण में उतार लेता हूँ. प्राप्त किए अपने अनुभवों को मन:दर्पण में उतार लेता हूँ.
प्रतीक जीवंत हो उठे हैं और जीवंतता इतिहास की तरफ सरक रही है. प्रतीक जीवंत हो उठे हैं और जीवंतता इतिहास की तरफ सरक रही है.
कल्पवृक्ष के समान हमारी हर इच्छाओं को पूरी करते कल्पवृक्ष के समान हमारी हर इच्छाओं को पूरी करते
आत्मनिर्भर हो सब क्षेत्र पर आत्मविश्वास से भरी आत्मनिर्भर हो सब क्षेत्र पर आत्मविश्वास से भरी
गांधी को गढ़ने से पहले खुद को तो जरा गढ़ लीजिए, गांधी को गढ़ने से पहले खुद को तो जरा गढ़ लीजिए,
हरियाली प्राणों की बंजर बिन प्रहार जब चुभते खंजर हरियाली प्राणों की बंजर बिन प्रहार जब चुभते खंजर
सच झूठ से ऊंचा, फिर भी सच का उड़ता मज़ाक, सच की खामोशी को दबा रहा है झूठ की आवाज़, सच झूठ से ऊंचा, फिर भी सच का उड़ता मज़ाक, सच की खामोशी को दबा रहा है झूठ की आ...
मेघ देखूं ,जल देखूं, दर्पण देखूं हाथों के कंगन खनकते, संवरते, और टूट जाते मेघ देखूं ,जल देखूं, दर्पण देखूं हाथों के कंगन खनकते, संवरते, और टूट जाते
शांति चित्त हो देख रही थी वसुधा ईश्वर का हर खेला। शांति चित्त हो देख रही थी वसुधा ईश्वर का हर खेला।
बने जीविका अभिनेता की। बनती गौरव यह नेता की॥ बने जीविका अभिनेता की। बनती गौरव यह नेता की॥
छुपे मुझमें ही कहीं बनकर मेरी एक अनलिखी_कविता। छुपे मुझमें ही कहीं बनकर मेरी एक अनलिखी_कविता।
जाने कितनी धारणाएँ जो निर्मित है मन के बारे में अंततः मन स्वीकार्य होगा। जाने कितनी धारणाएँ जो निर्मित है मन के बारे में अंततः मन स्वीकार्य होगा।
भाषा होती हमारी पहचान बिन भाषा के नहीं होता ज्ञान। भाषा होती हमारी पहचान बिन भाषा के नहीं होता ज्ञान।
उम्र भर मैं कविता लिखती रही कभी कुछ तो कभी कुछ. उम्र भर मैं कविता लिखती रही कभी कुछ तो कभी कुछ.
भ्रम का शिकार बन गुमराह न हो जाओ, मानव तन जब मिल गया तो मानवता का धर्म निभाओ। भ्रम का शिकार बन गुमराह न हो जाओ, मानव तन जब मिल गया तो मानवता का धर्म ...
शरद पूर्णिमा के चाँद को देख मन हर्षा अम्बर से होगी आज अमृत वर्षा। शरद पूर्णिमा के चाँद को देख मन हर्षा अम्बर से होगी आज अमृत वर्षा।
शीत में करे संग्रहण ताप में होता हिमद्रवण। शीत में करे संग्रहण ताप में होता हिमद्रवण।
जिन लोगों से हम कतराते थे उनका साथ तस्लीम किया जिन लोगों से हम कतराते थे उनका साथ तस्लीम किया