शरणागति
शरणागति
शरणागति
बचपन में मुझे माँ कहती थी
पुण्य करो तो स्वर्ग में जाते
नर्क में जाते पाप करो तो
राम नाम लो पीते खाते ।
जब भी कोई कठिनाई होती
हनुमान चालीसा पढ़ते
हरि नाम ले परीक्षा में जाते
पास हो जाते डरते डरते ।
काम, अर्थ में लग गए थे
जब थोड़े बड़े हुए जो
धर्म थोड़ा पीछे छूट गया
पता नहीं था मोक्ष का तो ।
वृद्धावस्था में कदम रखा जब
जाना शास्त्रों में ज्ञान है बड़ा
रोग, संबंधी छूटने का भय
बुढ़ापा अब था मुंह बाएं खड़ा ।
रामायण पढ़ी, भागवत पढ़ी
गीता के कई संस्करण पढ़े
ज्ञान की ख़ान सभी ग्रंथ ये
सदाचार इनमें बड़े बड़े ।
ये कहें राग- द्वेष ना करो
मैं तो भरा पड़ा हूँ इनसे
कहें संसार तो एक स्वप्न है
मैं डूबा हुआ इसी माया में ।
क्या सत्य है, क्या असत्य है
चिंतन करता असत्य का ज़्यादा
करना चाहता सत्य का चिंतन
करूँ रोज़ अपने से ये वादा ।
हर रोज़ वादा ये करना पड़ता
शायद मन मलिन बहुत अभी
प्रभु भजन हर पल करूँ तो
दुर्दांत माया ये छूटेगी तभी ।
हे प्रभु शरणागत लो मुझको
पापी दुराचारी चाहे मैं
पर फिर भी हूँ अंश तेरा ही
दयालु हो बहुत, मैंने सुना है ।
अजय सिंगला
