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Ajay Singla

Classics

4.5  

Ajay Singla

Classics

शरणागति

शरणागति

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शरणागति 


बचपन में मुझे माँ कहती थी 

पुण्य करो तो स्वर्ग में जाते 

नर्क में जाते पाप करो तो 

राम नाम लो पीते खाते ।


जब भी कोई कठिनाई होती 

हनुमान चालीसा पढ़ते 

हरि नाम ले परीक्षा में जाते 

पास हो जाते डरते डरते ।


काम, अर्थ में लग गए थे 

जब थोड़े बड़े हुए जो 

धर्म थोड़ा पीछे छूट गया 

पता नहीं था मोक्ष का तो ।


वृद्धावस्था में कदम रखा जब 

जाना शास्त्रों में ज्ञान है बड़ा 

रोग, संबंधी छूटने का भय 

बुढ़ापा अब था मुंह बाएं खड़ा ।


रामायण पढ़ी, भागवत पढ़ी 

गीता के कई संस्करण पढ़े 

ज्ञान की ख़ान सभी ग्रंथ ये 

सदाचार इनमें बड़े बड़े ।


ये कहें राग- द्वेष ना करो 

मैं तो भरा पड़ा हूँ इनसे

कहें संसार तो एक स्वप्न है 

मैं डूबा हुआ इसी माया में ।


क्या सत्य है, क्या असत्य है 

चिंतन करता असत्य का ज़्यादा 

करना चाहता सत्य का चिंतन 

करूँ रोज़ अपने से ये वादा ।


हर रोज़ वादा ये करना पड़ता 

शायद मन मलिन बहुत अभी 

प्रभु भजन हर पल करूँ तो 

दुर्दांत माया ये छूटेगी तभी ।


हे प्रभु शरणागत लो मुझको 

पापी दुराचारी चाहे मैं 

पर फिर भी हूँ अंश तेरा ही

दयालु हो बहुत, मैंने सुना है ।


अजय सिंगला


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