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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत -२१३; कालियपर कृपा

श्रीमद्भागवत -२१३; कालियपर कृपा

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श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

भगवान कृष्ण ने देखा जब ये 

कि विषैला कर दिया यमुना का जल 

महाविषधर कालिय नाग ने।


तब उसे निकाल दिया वहां से 

शुद्ध करने को यमुना जी को 

परीक्षित ने पूछा, ब्राह्मण ! कैसे 

निकाला कृष्ण ने उस सर्प को।


कालियनाग तो जलचर जीव नहीं 

अनेकों युगों तक ऐसी दशा में 

जल में क्यों और कैसे रहा 

यह सब मुझे बतलाइये।


श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

कालिय का एक कुंड था यमुना में 

हर समय उसका जल था जो 

खोलता रहता विष की गर्मी से।


यहाँ तक कि उस कुंड के ऊपर

उड़ने वाले पक्षी झुलस कर 

गिर जाते उसी कुंड में और 

वृक्ष, पशु भी मर जाते थे तट पर।


जब भगवान ने देखा कि 

वेग भयंकर विष का सांप के 

कदम्ब के एक वृक्ष पर चढ़कर 

कूद पड़े वे विषैले जल में।


विष से जल पहले ही खोल रहा 

भगवान कृष्ण के कूद जाने से 

और भी उछलने लगा वो 

क्रीड़ा कर रहे कृष्ण थे उसमें।


बड़े जोर का शब्द हुआ इससे 

आँख से सुनने वाले कालिय ने 

जब आवाज सुनी और देखा कोई 

तिरस्कार कर रहा निवास का मेरे।


उससे ये सहन न हुआ 

चिढ़ कर आ गया सामने कृष्ण के 

सांवला सलोना एक बालक 

देखा उसने एक खड़ा सामने।


अत्यंत सुकुमार शरीर है उसका 

श्रीवत्स का चिन्ह वक्षस्थल पर 

धारण किया हुआ है उसने 

पीले रंग का एक वस्त्र।


जब कालिय ने देखा कि 

बालक तनिक भी न डरा हुआ 

विषैले जल में भी खेल रहा है 

उसका क्रोध और भी बढ़ गया।


श्री कृष्ण को डसकर उसने 

जकड़ लिया शरीर के बंधन में 

नागपाश के बंधन में बंधकर

श्री कृष्ण निश्चेष्ट हो गए।


यह देख सब सखा ग्वाले 

बहुत ही पीड़ित हुए थे 

सबके सब मूर्छित होकर 

वहीं पृथ्वी पर गिर पड़े।


गाय, बैल और बछड़े भी 

बड़े दुःख से डकराने लगे 

उधर व्रज में, पृथ्वी आकाश में 

बड़े उत्पात उठ खड़े हुए।


किसी अशुभ घटना की सूचना दे रहे 

और देखकर उन अपशकुनों को 

कृष्ण के लिए आशंकित हो गए 

नंदबाबा और गोप गोपियाँ जो।


उसी क्षण दुःख में आतुर होकर 

कृष्ण को देखने की लालसा से 

घर द्वार छोड़ निकल पड़े 

कृष्ण को ढूंढने वन में।


बलराम जी तो सर्वशक्तिमान हैं 

व्रज वासियों को आतुर देखकर 

हंसने लगे पर बोले कुछ नहीं 

पहुँच गये सब यमुना तट पर।


वहां पर उन्होंने देखा कि 

कालिय नाग ने श्री कृष्ण को 

बाँध रखा अपने शरीर से 

चेष्टाहीन हो रहे वो।


ग्वाल बाल किनारे पर उस कुंड के 

अचेत होकर पड़े हुए थे 

गायें , बछड़े आदि जो वहां 

आर्त्तस्वर में डकरा रहे थे। 


यह देख गोप व्याकुल हो गए 

और मूर्छित हो गए अन्त में 

गोपियों को दुःख हुआ और कृष्ण बिना 

तीनों लोक सूने दिखने लगे। 


माता यशोदा तो लाल के पीछे 

कालियदाह में कूदने जा रहीं 

परन्तु गोपियों ने पकड़ा उन्हें 

दुखी हो रहे नंदबाबा भी। 


जीवन प्राण उनके थे कृष्ण में 

घुसने लगे वो कालियदाह में 

बलराम जी ने यह देखकर 

समझा बुझाकर रोक दिया उन्हें। 


जब कृष्ण ने देखा ये सब 

तो मोटा किया अपने शरीर को 

सांप का शरीर जब टूटने लगा 

बंधन से उसके निकल गए वो। 


नागपाश छोड़ अलग हो कालिय 

फ़न फैलाकर अपने क्रोध में 

फुफकारे मारने लगा सांप वो 

विष की फुहारें निकलें नथुनों से। 


आँखें उसकी लाल हो गयीं 

मुँह से आग की लपटें निकल रहीं 

तब तनिक दबाकर सिरों को उसके 

कृष्ण सवार हुए उसके सिर पर ही। 


नृत्य करने लगे सिरों पर 

एक सो एक सिर थे उसके 

पैरों की चोट से कुचल रहे कृष्ण 

खून उगले वो मुँह और नथुनों से। 


इसके बाद वो बेहोश हो गया 

चरणों पर उस समय कृष्ण के 

खून की बूँदें पड़ती थीं जो मानो 

पूजा हो रही रक्त पुष्पों से। 


भगवान के नृत्य से कालिय का 

अंग अंग था चूर हो गया 

मुँह से खून की उलटी होने लगी 

नारायण का स्मरण हो आया। 


बहुत व्याकुल हो रहा वो 

भगवान की एड़ियों की चोट से 

छत के समान जो लग रहे 

छिन्न भिन्न फ़न हो गए उसके। 


अपने पति की दशा देखकर 

पत्नियां भगवान की शरण में आयीं 

बालकों को आगे रखकर वो 

पृथ्वी पर सब लेट गयीं। 


श्री कृष्ण को प्रणाम किया 

और पति को छुड़ाने के लिए 

शरण ग्रहण की श्री कृष्ण की 

उन सभी नाग पत्नियों ने। 


कहें प्रभु, अवतार हुआ आपका 

दुष्टों को दण्ड देने के लिए 

दण्ड देना सर्वथा उचित है 

इस अपराधी को इसीलिए। 


यह दण्ड आपका कृपाप्रसाद है 

क्योंकि आप जो दण्ड देते हैं 

उससे ही उन दुष्टों के 

सारे पाप नष्ट होते हैं। 


भगवान हम समझ नहीं पातीं 

यह किस साधना का फल है इसकी 

कि अधिकारी हुआ स्पर्श पाने का 

धूल जो आपके चरणकमलों की। 


तमोगुणी योनि में उत्पन्न हुआ ये 

अत्यंत क्रोधी नाग है ये तो 

पवित्र चरणरज प्राप्त हुई इसको 

सर्वथा दुर्लभ होती है जो। 


प्राप्त करने की इच्छा से ही जिसके 

मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाती 

प्रभु प्रणाम करती हम आपको 

लीलाएं अमोघ आपकी। 


तीन प्रकार की योनियां त्रिलोकी में 

सत्त्वगुणप्रधान शांत योनि है 

रजोगुणप्रधान अशांत है 

तमोगुणप्रधान मूढ़ है। 


ये आपकी तीन मूर्तियां हैं 

पहचाने न ये मूढ़ आपको 

कृपा कीजिये इस सर्प पर 

आप क्षमा कर दीजिये इसको।


साधु पुरुष सदा से ही दया 

करते आये हम अबलाओं पर 

हमारा पति दे दीजिये हमें 

हम दसियों पर कृपा कर। 


आप हमें आज्ञा दीजिये 

हम आपकी क्या सेवा करें 

बेसुध हो रहा उस समय कालिय 

भगवान के चरणों की चोट से। 


उसकी स्त्रियों की स्तुति से 

छोड़ दिया उसे भगवान ने 

थोड़ी देर बाद दीनता से 

हाथ जोड़ बोले वो कृष्ण से। 


नाथ, हम जन्म से ही 

जीव दुष्ट, तमोगुणी, क्रोधी बड़े 

इस माया के चक्र में हम 

सर्वथा ही मोहित हो रहे। 


इस दुस्तज्य माया का 

अपने प्रयत्न से त्याग कैसे करें 

आप सम्पूर्ण जगत के स्वामी 

कृपा कीजिये और दण्ड दीजिये ।’


 शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

 कालियनाग की बात सुनकर तब 

भगवान ने उसको कहा, तुम्हें 

यहाँ नहीं रहना चाहिए अब। 


अपने पुत्र, पत्नियों के साथ में 

शीघ्र ही समुद्र में चला जा 

सांपों का कभी भय न हो उसे 

मनुष्य स्मरण जो करे इस कथा का। 


जानता मैं कि गरुड़ के भय से 

रमणक छोड़ तुम यहाँ आ बसे

चरण मेरा अंकित तुम्हारे शरीर पर 

गरुड़ अब खाये न तुम्हें। 


शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

ऐसी आज्ञा पाकर कृष्ण की 

कालियनाग ने परिक्रमा की 

और फिर पूजा की उनकी। 


भगवान को प्रसन्न करके वह

पत्नी, पुत्र, बंधुओं के साथ में 

रमणक द्वीप में चला गया जो 

सांपों का रहने का स्थान समुद्र में। 


लीला मनुष्य भगवान कृष्ण ने 

विषहीन किया जल यमुना जी का 

और ऐसे ये जल यमुना का 

अमृत के समान था मधुर हो गया। 




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