प्रेम वर्षा
प्रेम वर्षा
प्रेम वर्षा
अहंकार की छतरी ओढ़े
चल रहा जीवन पथ पर मैं
प्रभु कृपा छू ना रही मुझे
वो तो बरसा रहे सदा प्रेम हैं ।
मैं, मेरे का अहंकार ये
कब छूटेगा मुझ अधम का
भीगूँगा कब प्रेम कृपा से
इस छतरी को कब छोड़ूँगा ।
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर
दुर्लभ है तजना इन सबको
चर-अचर, जड़- चेतन सब में
कब देखूँगा अपने रब को ।
माया जगत में लगा हुआ है
मन, वाणी और शरीर मेरा
शरणागत कब लोगे आप मुझे
कब सानिध्य होगा मुझे तेरा ।
शास्त्र पढ़ लिए, वेद पढ़ लिए
संसार तो ये है बस माया ही
कहते हैं जगत असत्य है
सत्य लगे पर मुझको ये अभी ।
सोचूँ क्या साधन से ज्ञान मिले
उत्तर आया कि नहीं नहीं
ईश्वर फिर कैसे हैं मिलते
इसका कारण प्रभु की कृपा ही ।
चित लगा हुआ है विषयों में
मन, इन्द्रियाँ मेरे वश में नहीं
चाहता हूँ भगवान को पाना
चिन्तन पर जाता और कहीं ।
हे प्रभु, ना जानूँ क्या करूँ
फिर सोचूँ करने से क्या हो
मुझको भिगो दो अंतरमन तक
प्रेम कृपा ऐसी बरसा दो ।
