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Ajay Singla

Inspirational

4.4  

Ajay Singla

Inspirational

प्रेम वर्षा

प्रेम वर्षा

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प्रेम वर्षा 


अहंकार की छतरी ओढ़े 

चल रहा जीवन पथ पर मैं 

प्रभु कृपा छू ना रही मुझे 

वो तो बरसा रहे सदा प्रेम हैं ।


मैं, मेरे का अहंकार ये 

कब छूटेगा मुझ अधम का 

भीगूँगा कब प्रेम कृपा से 

इस छतरी को कब छोड़ूँगा ।


काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर 

दुर्लभ है तजना इन सबको 

चर-अचर, जड़- चेतन सब में 

कब देखूँगा अपने रब को ।


माया जगत में लगा हुआ है 

मन, वाणी और शरीर मेरा 

शरणागत कब लोगे आप मुझे 

कब सानिध्य होगा मुझे तेरा ।


शास्त्र पढ़ लिए, वेद पढ़ लिए 

संसार तो ये है बस माया ही 

कहते हैं जगत असत्य है 

सत्य लगे पर मुझको ये अभी ।


सोचूँ क्या साधन से ज्ञान मिले 

उत्तर आया कि नहीं नहीं 

ईश्वर फिर कैसे हैं मिलते 

इसका कारण प्रभु की कृपा ही ।


चित लगा हुआ है विषयों में 

मन, इन्द्रियाँ मेरे वश में नहीं 

चाहता हूँ भगवान को पाना 

चिन्तन पर जाता और कहीं ।


हे प्रभु, ना जानूँ क्या करूँ 

फिर सोचूँ करने से क्या हो 

मुझको भिगो दो अंतरमन तक 

प्रेम कृपा ऐसी बरसा दो ।


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